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तिजोरियां

कहां जा रहे हो सच्ची खुशी की तलाश में  एक राज की बात बताऊं ! बाहर जाओगे तो भटक जाओगे  कीमती मूल्यवान वस्तुऐं अक्सर  तिजोरियों में छिपाकर रखी जाती हैं  भीतर की यात्रा पर निकल जाओ  अमूल्य रत्नों की भरमार मिलेगी । कई रहस्यमय शक्तियों से पहचान होगी  चमत्कार की खान मिलेगी ।
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स्वागत की परम्परा

स्वागत की परम्परा तो हम इस.कदर निभाते हैं  की गुलाब ना भी मिले अगर राहों में बिछाने के लिए   हम अपनी पलकों के गुलाब  बिछाते हैं। आवभगत में तो.हम आसमान से तारे भी तोङ.लाते हैं  आज कोई हमारा मेहमान है, तो कल हम भी किसी के मेहमान हो सकते हैं  स्वागत की चाह हर कोई रखता है  फिर  हम जो चाहते हैं वो हम देना भी सीखें  मन में जज्बा लिये कुछ कर दिखाने का  बस कुछ ना कुछ करते रहे,करते रहे और आगे निकल गये  करते रहे ,पर यूं ही नहीं कुछ भी करते रहे  माना की राहें अंजानी थीं  मन की ना मेहमान थीं  फिर भी अतिथि सम्मान में  स्वागत की परम्परा निभाते रहे  खुशीयां देकर खुशियों से दामन भरते रहे   बेमतलब में नहीं यूं ही सफर करते रहे  सफर में तजुर्बों से झोली भरते रहे  नजर लक्ष्य पर थी,मन में उम्मीद थी  मंजिलों की राहों से अंजान थे  पर दिल में ठसक थी ,उम्मीद की किरण की चमक थी  कहते हैं ना जहां चाह वहां राह  बस राहों में चाहों का रंग भरते रहे  जीवन में खुशियों के रंग भरने थे  एक उम्मी...

जश्न मना

जश्न मना सफर कर  अंजान हैं राहें, लौटना होगा मगर  यह भी तय है  पगडंडियों की ना परवाह कर   रास्तों की उबड़-खबङ  पैरों में पत्थरों की रगङ  गम ना कर ज़ख्म यह भर जायेगें  हार -जीत की ना तू परवाह ना कर  चल निकल चल चलाचल  ऊंच-नीच की पहाङियां  समीप गहरी खाईयां  रास्ते कट जायेगें  नामुमकिन तो कुछ भी नहीं  तू खुद शहनशाह  तू स्वयं ही अपना बादशाह   सवालों को तू हल कर   बुद्धि,विवेक की कूंजियां  भीतर तेरे पूजियां  रास्तों की ना तू फिक्र कर  ऊंचें पहाड़ हो या गहरी खाईयां  काम तेरा है मंजिल तक पहुँचना  श्रेणी की  ना कर लालसा  कर्म की रख प्रधानता  जश्न मना कर ना देर कर  प्रश्नों के तू हल निकाल  जीवन बनेगा तेरा खुशहाल।  

परवरिश बाल मन की

       प्रस्तावना  आगे बढना प्रकृति का नियम है। प्रकृति एवं मनुष्य अपनी -अपनी नियति के अनुसार बढ़ते रहते है,उनका एक जीवन चक्र है जो निर्धारित समय के अनुसार चलता रहता है । *यहां हमारा विषय है *परवरिश बाल मन की*  हल्के में मत लिजिए इस परवरिश को ,बहुत ही जिम्मेदारी का काम है यह परवरिश* प्रकृति के संरक्षण के लिए परमात्मा ने स्वयं व्यवस्था की है ,मौसमों के रुप में ,वायु सूर्य मिट्टी खाद ,जल प्रकृति का पोषण करते हैं ।   आज का मंहगाई का जमाना , परिवार का खर्चा चलाना , बिजली ,पानी दुनियां भर की आधुनिक सुविधाओं की आवयशकता ,बच्चों की शिक्षा के नये-नये कार्यक्रम उसके खर्चे ,कई परिवारों में आवयशकता हो जाती है ,पति -पत्नी दोनों का घर से बाहर निकल कर काम करना ।  क्यों ना हो , सबको समानता का अधिकार जो है ।अगर सामने वाले में काबिलियत है ,तो काम करने में कोई बुराई  नहीं ।                   (  1)  सरीन परिवार शहर का एक सम्पूर्ण सम्पन्न परिवार धन -दौलत एश ओ आराम घर के सदस्यों के मुंह से एक भी मांग निकल...

मेरे अपने

जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं  वो मेरे सामने नहीं होकर भी  मेरे पास होता है, लोग कहते हैं  यह तेरे मन का धोखा है  मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है  वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है  मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है   कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है । मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है । वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है  मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है मैं रहती धरती पर हूं  बातें आसमान की करती हूं  चलती धरा पर हूं  और नजरें ऊपर आसमान की  ओर रहती हैं । ऊपर की ओर इसलिए नहीं की स्वयं को बडा  समझती हूं ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में  क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च  ऊचांइयों में ।

अमरंतगी

 अमरतंरगी कालातीत अटल अविचल   देवनदी ,सुरसरि शाश्वत सत्य सटीक  ,निसर्ग संजीवनी भारतवर्ष सौभाग्यम आरोग्य नाशनम मां गंगा तूभ्यम् शत-शत नमन - प्रतिज्ञ संरक्षणम अमोल सम्पदा  प्राकृतिक लावण्य  देव औषधम धन्वन्तरि जयति-जयति जयम  गंगे मैय्या की जय--  जीवन में सरलता स्वभाव मेरा तरलता मुझमें निहित स्वच्छता गुण मेरा निर्मलता क्योंकि मैं तरल हूं इसलिए मैं सरल हूं इसलिए मैं निश्चल हूं मैं प्रतिबद्ध हूं अग्रसर रहना मेरी प्रकृति शीतलता देना मेरी प्रवृति मुझमें अथाह प्रवाह है  मुझमें ऊर्जा का भंडार मुझमें जो बांधे बांध हुए ऊर्जा का संचार जीवन का अद्भुत व्यवहार देना जीवन का आधार ऊर्जा का कर दो संचार तभी दूर होगा अन्धकार सही जीवन का यही उपचार जीवन में भर लो सगुण संस्कार  कविता मात्र शब्दों का मेल नहीं वाक्यों के जोड़ - तोड़ का खेल भी नहीं कविता विचारों का प्रवाह है अन्तरात्मा की गहराई में से  समुद्र मंथन के पश्चात निकली  शुद्ध पवित्र एवम् परिपक्व विचारो के  अमूल्य रत्नों का अमृतपान है  धैर्य की पूंजी सौंदर्य की पवित्रता प्रकृति सा आभूष...

इतनी जल्दी किस लिये

मेरे अपने सदैव कहते रहे  जीवन का आनंद लो  इतनी जल्दी किस बात की  मैं हमेशा जल्दी में रहा  हर काम जल्दी में  करता रहा इतनी जल्दी  कि जिस जीवन को सुखमय  बनाने के लिए मैं जल्दी करता रहा  वह जीवन भी ढंग से नहीं जी पाया  और वह.जीवन भी निकल गया जल्दी में ..