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चल रहा हूं बङ रहा हूं

कुछ चला हूं,कुछ.रुका हूं,कुछ छला हूं  अपने कर्मों का कारवां लेकर चला हूं । रास्तों का मैं भूला हूं  अपनों को छोङकर  अपना जहां बनाने निकला हूं  अपनी जिन्दगी अपने ढंग से जीने चला हूं  कुछ चला हूं ,कुछ रुका हूं कुछ छला हूं  क्यों कहूं जमाने से डरा हूं मैं अपने ही कर्मों का पला हूं  कौन डरा सकता है मुझे मैं डर को धकेल पीछे आगे की और बङा हूं  माना की बहुत कुछ पाया है मैने  फिर भी बहुत कुछ पीछे छोङ आगे बङा हूं  खुश हूं बहुत कुछ पाया मैने  कौन कहता है कि मैं अकेले चला हूं  अपने कर्मों का कारवां लेकर चला हूं  चल रहा हूं ,बङ रहा हूं,  जीवन का चक्र पूरा कर  रहा हूं   
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जीना सिखाया

दुनियां ने मुझे जीना सीखाया   ठोकरों पर ठोकरों ने मुझमें मेरा आत्मविश्वास जगाया  जब से मैं टूटा ,जमाना मुझसे रूठा  मैं अकेलेपन से लङा  एक मजबूत इरादा बनकर उठा मैं पूर्णता को प्राप्त हो गया  बिखर-बिखर के सिमटने लगा  मुझमें जुङने का गुण आ गया  धन्यवाद उन लोगों का जिन्होंने  मेरी कदर नहीं जानी  मुझे ठोकरें पर ठोकरें मारी  मैं गिर-गिर के मजबूत हो गया हूं  मुझे अपनी कदर करनी आ गयी  स्वयं की ताकत से परिचित हो गया  मैं इतना तपाया  गया की खरा सोना हो गया  मुझे मेरा अस्तित्व मिल गया  मेरी स्वयं से पहचान हुई मैं धूल -धूल था ,शूलों से घायल अब जीने के काबिल हो गया हूं  मैं खरा सा सोना हो गया हू।

नया अध्याय

  नया अध्याय   Feed Library Write Notification Profile Ritu asooja Abstract 4   नया अध्याय 5 mins   320  जीवन     रंग     अध्याय  तुम कब तक यूँ अकेली रहोगी?", लोग उससे जब तब यह सवाल कर लेते हैं और वह मुस्कुरा कर कह देती है," आप सबके साथ मैं अकेली कैसे हो सकती हूं। (उसकी शांत आंखों के पीछे हलचल होनी बन्द हो चुकी है) " अरे वाह! क्या सीख रही है इन दिनों?", संदली ने कृत्रिम उत्साह दिखाते हुए कहा जिसे जानकी समझ कर भी अनदेखा कर गई"। आखिर संदली ने जीवन के इतने उतार-चढाव देखे थे , कुछ ना कह कर भी संदली ने जानकी को बहुत कुछ कह दिया था जो वह नहीं कह पा रही थी  जानकी जीवन में बस आगे और आगे बड़े कभी पीछे मुड़कर ना देखे ,पीछे मुड़कर देखना भी पड़े तो ,बीते हुए पलों से सबक लेकर बेहतर से बेहतर करे ,क्योंकि कोई भी इंसान ठोकरें खाकर मजबूत और मजबूत ही होता है ,मानसिक रूप से तो अवश्य ,सम्भल कर चलना सीख ही जाता है। और अपने अनुभवों से दूसरों को ठोकरें खाने से बचने के लिए प्रेरणा देता है।  संदली जानती थी की जानकी टूटी है , पर बिखरी नही...

नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में

मनचला सा दिल मेरा व्योम में था जा रुका  नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में  नक्षत्र सभी दमक रहे  स्वर्णिम रुप था अजब  राग संग रागनी  चंचल-चपल कामिनी  चन्द्रप्रभा बन सज्जाकर जाह्नवी रीझा रहा रही  नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में  रजत आभा श्रृंगार से दमक रही सुरसरी  तरल द्रव्य और चांदनी वर्क चढ रहा  असीम कांति बङ रही  निशा संग समीर भी मंद-मंद थी चल रही  वारि लहरें मानों बह-बह के कह रही  चल बैठ आ जरा कुछ पल तो गुजार ले  मन वनकर मनचला खगोल के भूगोल में  विस्मयकारी अन्वेषण करने लगा  वसुन्धरा के श्रृंगार को  बरस-बरस रही थी चन्द्रप्रभा  मनचला सा दिल मेरा  वयोम में जा रुका   तारों की बारात सजी  बरस-बरस रही था चन्द्र द्रव्य  अमृतद्रव्य अंलकार देवनदी रिझा रहा  रजत आभा कांति सुरसरी को भा रही  निसर्ग के सौंदर्य उस पर आलौकिक एश्वर्य की  धनिकता सर्व सम्पन्न हो रहा  अम्बर के एश्वर्य से वसुन्धरा भी सरस रही 

रानी राजरानी

 हां बचपन से मैं अपने मन की राजरानी हूं ,पर यह कदापि नहीं की मैंने अपने को बडा दिखाने के लिए कभी किसी को छोटा समझा हो या नीचा दिखाया हो । मैं एक संयुक्त परिवार में पली-बङी लङकी, जहां जरूरतें तो आपकी सब पूरी होती हैं ,आपके सपने भी ऊँचे-ऊंचे होते हैं,आपको सपने देखने का तो पूरा हक होता है लेकिन सपनों को पूरा करने के लिए सीमायें लांघने की अनुमति नहीं । मेरे भी सपने थे,लेकिन शहर से बाहर जाकर सीमायें लांघना यानि लक्ष्मण रेखा पार करना ,और अगर लक्ष्मण रेखा पार कर ली तो परिवार की नाक कटने के बराबर था । मैने चित्रकला में पी.एच .डी कर ली थी । लेकिन मुझे मेरी कला को अपने और अपने परिवार तक सीमित रखने की आज्ञा थी ।  मेरे सपनों के पंख आसमान की ऊंचाइयां छूने बेताब थे । कई बार कई प्रतियोगिताओं में भाग लेने के निमंत्रण आये पर अपने शहर से बाहर जाने की मुझे नहीं मिली । हमारे दादाजी हर दिन की तरह आज अपनी बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे और अखबार पङ रहे थे, अचानक मेरी मां को पास बुलाते हुये  कहा दो दिन बाद  काव्या यानि मुझे लङके वाले देखने आने वाले हैं बात पक्की होते ही वो ,जल्...

जीतना ही लक्ष्य है

 दौङने का वक्त है जीतना ही लक्ष्य है सम्भलना भी ध्येय हो चल तू पर सम्भल कर चल  भागने की होङ में त्रुटियां जो हों अगर सीख ले सबक ले  मार्गदर्शक की भूमिका बना तू बनाकर चल, हौसलों की बनाकर  ढाल प्रश्नों के तू हल निकाल उत्तरों की ना परवाह कर फार्मूलों की सही पकङ मुश्किलों की सही डगर जीत है पक्की अगर सही राह पर चला ऊंच-नीच का सफर रास्तों पर मोङ हों चेतावनी हैं भली ,प्रश्नों की खलबली तनिक सा विश्राम ले ,हल निकल ही जायेगा सम्भल कर जो तू चला दौङ में होगा भी पीछे अगर सही होगी जो तेरी पकङ जीत होगी पक्की फिर मगर विवेक से जो तू चला , कभी दौङा कभी धीमे ही चला कारवां चलता गया मंजिलों का सिलसिला जीत का होगा जश्न उम्मीद की लेकर जो तू मशाल चला 

बुद्ध होते तो युद्ध ना होता

  बुद्ध होते तो युद्ध ना होता  कारण बुद्ध को हमने मंदिरों में  पूजाघरों में सीमित कर दिया  जीवन में नहीं उतारा ,द्वंदों ने - अंहकार में अपना कद बङा कर लिया  शक्तियों का वर्चस्व चला  युद्ध  तो अवश्यभावी हो गया  निर्बल,असहाय, बलि चढे  विवेक की आंखों पर पर्दा पङ गया  युद्ध ने दस्तक दी ,विनाश का तांडव चला  अंहकार-अंहकार से टकराया मासूमियत झूलस-झूलस कर अंतहीन  दर्द की कहानी लिख रही थी  गोले ,बारूद ने शहर के शहर विनाश किये  सभ्यता को एक युग पीछे की ओर धकेल दिया  अशोका ने भी बहुत युद्ध लङे और कंलीगा बने  दर्द की आह से जब कराहा निकली ,तब आह की कोख से बुद्ध जागा विनाश की अंतहीन लीला ने मन विचलित हुआ । शक्ति युद्ध में भी थी, पर विनाश की लीला चली  अंत में शक्ति के रुप में जब बुद्ध जागा  जीत तो बुद्ध की ही हुई  .