कुछ चला हूं,कुछ.रुका हूं,कुछ छला हूं अपने कर्मों का कारवां लेकर चला हूं । रास्तों का मैं भूला हूं अपनों को छोङकर अपना जहां बनाने निकला हूं अपनी जिन्दगी अपने ढंग से जीने चला हूं कुछ चला हूं ,कुछ रुका हूं कुछ छला हूं क्यों कहूं जमाने से डरा हूं मैं अपने ही कर्मों का पला हूं कौन डरा सकता है मुझे मैं डर को धकेल पीछे आगे की और बङा हूं माना की बहुत कुछ पाया है मैने फिर भी बहुत कुछ पीछे छोङ आगे बङा हूं खुश हूं बहुत कुछ पाया मैने कौन कहता है कि मैं अकेले चला हूं अपने कर्मों का कारवां लेकर चला हूं चल रहा हूं ,बङ रहा हूं, जीवन का चक्र पूरा कर रहा हूं
दुनियां ने मुझे जीना सीखाया ठोकरों पर ठोकरों ने मुझमें मेरा आत्मविश्वास जगाया जब से मैं टूटा ,जमाना मुझसे रूठा मैं अकेलेपन से लङा एक मजबूत इरादा बनकर उठा मैं पूर्णता को प्राप्त हो गया बिखर-बिखर के सिमटने लगा मुझमें जुङने का गुण आ गया धन्यवाद उन लोगों का जिन्होंने मेरी कदर नहीं जानी मुझे ठोकरें पर ठोकरें मारी मैं गिर-गिर के मजबूत हो गया हूं मुझे अपनी कदर करनी आ गयी स्वयं की ताकत से परिचित हो गया मैं इतना तपाया गया की खरा सोना हो गया मुझे मेरा अस्तित्व मिल गया मेरी स्वयं से पहचान हुई मैं धूल -धूल था ,शूलों से घायल अब जीने के काबिल हो गया हूं मैं खरा सा सोना हो गया हू।