मैने अपने जीवनकाल में सबसे अच्छे से अगर किसी रिश्ते को निभाया है तो वो है मां की भूमिका जो मैने सबसे अच्छे से निभाई है । यूं तो लगभग हर माता-पिता इस रिश्ते को अच्छे से निभाते हैं और अपनी और से बेहतरीन से बेहतरीन परवरिश करते हैं । जब हम परिवार में रहते हैं तो हमारा एक रिश्ता नहीं होता ,हम कई रिश्तों में बंधे होते हैं , मां -बच्चों का रिश्ता,पिता का रिश्ता,दादा-दादी, नाना नानी, चाची ,मामा-मामी ,बुआ मौसी आदि का रिश्ता। हम हर रिशते का उसकी मर्यादा सम्मान, स्नेह से निभाते हैं। परिवार से ही हममें संगठन,और अनुशासन की भावना जागृत होती है। लेकिन जब एक लङकी मां बनती है ,तब वह अपना सर्वस्व लुटा देती है ,अपने बच्चों की परवरिश में । एक लड़की विवाह के बाद जब मां बनती है ,तो वह अपनी सबसे प्यारी चीज जो अधिकतर हर लङकी को प्यारी होता है ,उसकी सुन्दरता रूप रंग ढील -ढोल सब कुछ भुला देती है,अपने बच्चे की परवरिश में ।
शाश्वत- जो सदैव से है ,जिसका ना आदि ना अंत सनातन से सृष्टि की उत्पत्ति हुई । सनातन यानि सत्य का विस्तार सन-जो सत्य है तन यानि विस्तार जहां से सृष्टि की उत्पत्ति हुई एवं आज जो सृष्टि है वह सनातन के वंशज हैं । देश ,परिस्थिति एवं काल के अनुसार कई शाखायें बन गयीं ,मतभेद अलग-अलग हो गये ,किन्तु मूल में सबके सनातन ही है । सनातन सत्य है शाश्वत है आदि एवं अनन्त है। पहाङों की तलहटी में बसे अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर, पर्वतों की ऊंची-ऊची चोटियां जहां संगीत गाती हैं पर्वतों की कोख से जहां पवित्र नदियों का उद्गम स्थल है । पतित पावनी अमृतमयी मां गंगा के किनारे सघन वृक्षों की छांव में बैठकर जहां ऋषियों ने घोर तपस्या की ,उस ऋषिकेश धाम की पवित्रता अकथनीय अवर्णनीय आलौकिक है । हृषीकेश जिसको आम बोल-चाल की भाषा में ऋषिकेश ही कहा जाता है । हृषीकेश यानि इन्द्रियों के स्वामी रैभ्य श्रृषि की कठोर तपस्या मन और इन्द्रियों का संयम की कठोर तपस्या से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने रैभ्य ऋषि को हृषीकेश नारायण के अवतार में दर्शन दिये । ...