दौङने का वक्त है जीतना ही लक्ष्य है सम्भलना भी ध्येय हो चल तू पर सम्भल कर चल भागने की होङ में त्रुटियां जो हों अगर सीख ले सबक ले मार्गदर्शक की भूमिका बना तू बनाकर चल, हौसलों की बनाकर ढाल प्रश्नों के तू हल निकाल उत्तरों की ना परवाह कर फार्मूलों की सही पकङ मुश्किलों की सही डगर जीत है पक्की अगर सही राह पर चला ऊंच-नीच का सफर रास्तों पर मोङ हों चेतावनी हैं भली ,प्रश्नों की खलबली तनिक सा विश्राम ले ,हल निकल ही जायेगा सम्भल कर जो तू चला दौङ में होगा भी पीछे अगर सही होगी जो तेरी पकङ जीत होगी पक्की फिर मगर विवेक से जो तू चला , कभी दौङा कभी धीमे ही चला कारवां चलता गया मंजिलों का सिलसिला जीत का होगा जश्न उम्मीद की लेकर जो तू मशाल चला
बुद्ध होते तो युद्ध ना होता कारण बुद्ध को हमने मंदिरों में पूजाघरों में सीमित कर दिया जीवन में नहीं उतारा ,द्वंदों ने - अंहकार में अपना कद बङा कर लिया शक्तियों का वर्चस्व चला युद्ध तो अवश्यभावी हो गया निर्बल,असहाय, बलि चढे विवेक की आंखों पर पर्दा पङ गया युद्ध ने दस्तक दी ,विनाश का तांडव चला अंहकार-अंहकार से टकराया मासूमियत झूलस-झूलस कर अंतहीन दर्द की कहानी लिख रही थी गोले ,बारूद ने शहर के शहर विनाश किये सभ्यता को एक युग पीछे की ओर धकेल दिया अशोका ने भी बहुत युद्ध लङे और कंलीगा बने दर्द की आह से जब कराहा निकली ,तब आह की कोख से बुद्ध जागा विनाश की अंतहीन लीला ने मन विचलित हुआ । शक्ति युद्ध में भी थी, पर विनाश की लीला चली अंत में शक्ति के रुप में जब बुद्ध जागा जीत तो बुद्ध की ही हुई