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नवरात्रों के शुभ दिन आये

नवरात्री शुभ मंगल बेला  वसुंधरा साजे मेला   जगत जननी शक्ति स्वरूपा  नवदुर्गा नौ स्वरूपधारीणी  शैलपुत्री ,चंद्रघंटा,ब्रहमचारीणी , कूषमांडा ,संकंदमाता,कात्यानी देवी महाकाली,महागौरी,लक्ष्मी सिंह सवार दिव्य अवतार कमल नयन अम्बुज पद  बुद्धि -विवेक प्रदाता  नमित शीष चरण वंदन हृदय द्वार अभिनंदन जागृत हिय हर्ष आपार  पंकज,शंख,चक्र ,त्रिशूल  धारणी प्रकट भवानी आंगन -आंगन रची रंगोली  सुगंधित वातावरण  गेंदा,अम्बुज पुष्य साजे देवालय गूंज रहे शंख नाद   सुसंवागतम् जगतजननी  मन राखे शुभ व्यवहार  निसर्ग आभा शिशिर समीर  मन शीतल भय  सद बुद्धि व्यवहार  जय जननी जय मात भवानी  नतशीष बारंबार
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प्रकृति महादेव

दैवीय ऊर्जा शुभ-मंगल संकेत  शिव मास  हर्षित  व्योम  वसुंधरा जलाभिषेक अर्चन देव  रिमझिम फुहार नैसर्गिक श्रृंगार  विमल पेय जलमग्न तटनी  हरित तरुवर समृद्ध वसुंधरा  प्रकृति देव अर्चन महादेव 

आओ चरित्रवान बने

आओ चरित्रवान बने  गुणवान बने,विद्ध्यावान बने  आओ कुछ अच्छा सोचें  अच्छा बने,अच्छा करे  अच्छा बनने का  संकल्प करे,आगे बढे  सरिता के जल की भांति   सर्वस्व उद्धार करें,  विकारों को किनारे करें  अपने अस्तितव में जियें  अंहकार के आवरण से  स्वयं को दूषित ना करें  आप स्वयं सिद्धा हैं  स्वयं की छवि ना खराब करें  आत्ममंथन से स्वयं की पहचान करें ।

चल रहा हूं बङ रहा हूं

चल रहा हूं ,बङ रहा हूं  वर्ष पर वर्ष उम्र का सफर तय कर रहा हूं  कुछ चला हूं,कुछ.रुका हूं,कुछ छला हूं  अपने कर्मों का कारवां लेकर चला हूं । रास्तों का मैं भूला हूं  अपनों को छोङकर  अपना जहां बनाने निकला हूं  अपनी जिन्दगी अपने ढंग से जीने चला हूं  कुछ चला हूं ,कुछ रुका हूं कुछ छला हूं  क्यों कहूं जमाने से डरा हूं मैं अपने ही कर्मों का पला हूं  कौन डरा सकता है मुझे मैं डर को धकेल पीछे आगे की और बङा हूं  माना की बहुत कुछ पाया है मैने  फिर भी बहुत कुछ पीछे छोङ आगे बङा हूं  खुश हूं बहुत कुछ पाया मैने  कौन कहता है कि मैं अकेले चला हूं  अपने कर्मों का कारवां लेकर चला हूं  चल रहा हूं ,बङ रहा हूं,  जीवन का चक्र पूरा कर  रहा हूं  जीवन बढने का नाम है धीमे-धीमे से ही सही पर रुकूगा नहीं  रूक गया तो तालाब हो जाऊंगा बहता रहा चलते रहा तो मंजिल पर पहुंच जाओगे  दरिया से सागर ,फिर महासागर हो जाऊंगा ।  

जीना सिखाया

दुनियां ने मुझे जीना सीखाया   ठोकरों पर ठोकरों ने मुझमें मेरा आत्मविश्वास जगाया  जब से मैं टूटा ,जमाना मुझसे रूठा  मैं अकेलेपन से लङा  एक मजबूत इरादा बनकर उठा मैं पूर्णता को प्राप्त हो गया  बिखर-बिखर के सिमटने लगा  मुझमें जुङने का गुण आ गया  धन्यवाद उन लोगों का जिन्होंने  मेरी कदर नहीं जानी  मुझे ठोकरें पर ठोकरें मारी  मैं गिर-गिर के मजबूत हो गया हूं  मुझे अपनी कदर करनी आ गयी  स्वयं की ताकत से परिचित हो गया  मैं इतना तपाया  गया की खरा सोना हो गया  मुझे मेरा अस्तित्व मिल गया  मेरी स्वयं से पहचान हुई मैं धूल -धूल था ,शूलों से घायल अब जीने के काबिल हो गया हूं  मैं खरा सा सोना हो गया हू।

नया अध्याय

  नया अध्याय   Feed Library Write Notification Profile Ritu asooja Abstract 4   नया अध्याय 5 mins   320  जीवन     रंग     अध्याय  तुम कब तक यूँ अकेली रहोगी?", लोग उससे जब तब यह सवाल कर लेते हैं और वह मुस्कुरा कर कह देती है," आप सबके साथ मैं अकेली कैसे हो सकती हूं। (उसकी शांत आंखों के पीछे हलचल होनी बन्द हो चुकी है) " अरे वाह! क्या सीख रही है इन दिनों?", संदली ने कृत्रिम उत्साह दिखाते हुए कहा जिसे जानकी समझ कर भी अनदेखा कर गई"। आखिर संदली ने जीवन के इतने उतार-चढाव देखे थे , कुछ ना कह कर भी संदली ने जानकी को बहुत कुछ कह दिया था जो वह नहीं कह पा रही थी  जानकी जीवन में बस आगे और आगे बड़े कभी पीछे मुड़कर ना देखे ,पीछे मुड़कर देखना भी पड़े तो ,बीते हुए पलों से सबक लेकर बेहतर से बेहतर करे ,क्योंकि कोई भी इंसान ठोकरें खाकर मजबूत और मजबूत ही होता है ,मानसिक रूप से तो अवश्य ,सम्भल कर चलना सीख ही जाता है। और अपने अनुभवों से दूसरों को ठोकरें खाने से बचने के लिए प्रेरणा देता है।  संदली जानती थी की जानकी टूटी है , पर बिखरी नही...

नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में

मनचला सा दिल मेरा व्योम में था जा रुका  नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में  नक्षत्र सभी दमक रहे  स्वर्णिम रुप था अजब  राग संग रागनी  चंचल-चपल कामिनी  चन्द्रप्रभा बन सज्जाकर जाह्नवी रीझा रहा रही  नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में  रजत आभा श्रृंगार से दमक रही सुरसरी  तरल द्रव्य और चांदनी वर्क चढ रहा  असीम कांति बङ रही  निशा संग समीर भी मंद-मंद थी चल रही  वारि लहरें मानों बह-बह के कह रही  चल बैठ आ जरा कुछ पल तो गुजार ले  मन वनकर मनचला खगोल के भूगोल में  विस्मयकारी अन्वेषण करने लगा  वसुन्धरा के श्रृंगार को  बरस-बरस रही थी चन्द्रप्रभा  मनचला सा दिल मेरा  वयोम में जा रुका   तारों की बारात सजी  बरस-बरस रही था चन्द्र द्रव्य  अमृतद्रव्य अंलकार देवनदी रिझा रहा  रजत आभा कांति सुरसरी को भा रही  निसर्ग के सौंदर्य उस पर आलौकिक एश्वर्य की  धनिकता सर्व सम्पन्न हो रहा  अम्बर के एश्वर्य से वसुन्धरा भी सरस रही