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Showing posts from April 22, 2024

संवेदना की बाती

  सहयोग मीठा एहसास है ह्रदय में संवेदना  परस्पर प्रेम को जीवन का गणित बना।।  स्वार्थ बना सर्वोपरी, संवेदना मानों मरी कौन किसका है यहां, स्वार्थ ही सब कुछ हुआ।। मैं-मैं सब कर रहे, हम तो जाने कहाँ गया मेरा -मेरा का घमंड हुआ,समर्पण जाने कहाँ गया।। मैं-मैं की शोर मचा, बांध गठठ्रर सब खड़े मानों ले जायेगें सब साथ यह,इतरा रहे बड़े-बड़े।।    स्वप्न में स्वप्न दिखे हर्षा रहे, सब स्वप्न में,  नींद में सब थे दिखे, जाने क्यों लड़ रहे।।     अंहकार किस बात का ,आये शहंशाह बडे-बडे। महल ऊंचे सब .. धरे यहीं, दौलत पर संग्राम हुआ मिट गये नामोनिशान यहीं।।    जी गये जो जिन्दादिल थे, संवेदना थी जिनमें बची  त्याग, प्रेम दया सहानुभूति की बाती जगा रोशन किया जग सभी...  सहयोग की मशाल जला, जग होगा रोशन तभी।। 

संवेदना की आस

संवेदना की आस पर, जी रहे हैं सब यहां  एक दूजे के प्रेम से जीवन का यथार्थ यहां  वसुन्धरा का उपकार बढा, भार जो सबका सहा  मुझमें हो जो संवेदना,धरती मां को संरक्षण करूं।।  वृक्षों ने हमें फल दिये,शीतल छाया की शरण मिली  प्राण वायु जो दे रहे,वृक्षों के उपकार बढे.. संवेदना  मुझ में जगा..  क्यों प्राण उनके संकट में पड़े, कंक्रीट के महल  खड़े किये.. कहां गयी संवेदना प्राण अपने भी  दाव पर लगे..  जल ही जीवन तो कहा.. पर उस जल पर ही संकट पड़ा..  स्वार्थ की धुंध में सब कुछ थुमिल हुआ..  आंधियों की उठापटक, सब कुछ तितर-बितर हुआ  अपना ही सब समेट रहे.. रो रहा कोई दूजी और खड़ा.. पेट किन्हीं के फट रहे, कोई भूख से तड़फ रहा।  कहाँ गयी संवेदना कोई देखो तो जरा..  ऊंच-नीच के भेद में अंहकार का तांडव बड़ा  कराह रही मानवता.. संवेदना तू जाग जरा..  आस में तेरी यहाँ, मानवता को जगा, त्याग, दया प्रेम भाव की संवेदना की मशाल को जला।। 

संवेदनाओं का सौन्दर्य

संवेदनाऐं ही मनुष्य जाति का वास्तविक सौन्दर्य है। संवेदनाऐं मन के कोमल भाव हैं।  संवेदनाऐं मनुष्य मन का सौन्दर्य है संवेदनाओं से मनुष्य, मनुष्यता को प्राप्त करता है..  संवेदनाऐं ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है।  संवेदनाऐं ही इस संसार को सुन्दर बनाती हैं... दया, प्रेम, करूणा का पाठ पढाती हैं।  संवेदना विहीन मनुष्य पशु समान है.. संवेदना ना हो तो दुनिया में जंगल राज बढ जायेगा..मनुष्यता काअंत हो जायेगा.. मनुष्य ही मनुष्य का भक्षण कर जायेगा।। संवेदनाओं का जीवंत रहना अति आवश्यक है... संवेदनाऐं ही मनुष्य जीवन का मनुष्य मन का वास्तविक सौन्दर्य है।। 

संवेदनाओं का भव्य संसार

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम संवेदनाओं का भव्य संसार। लंका का राजा रावण,सवंदेन विहीन पशुवत व्यवहार।  कौशल्या,सुमित्रा ममतामयी दिव्य स्वरूप  मंथरा भयी संवेदनविहीन,प्रभाव कैकयी बनी विवेकशून्य।  संवेदनाओं का पतन, दिया श्रीराम को वनवास गमन।  भरत दिव्य रुप,संवेदनाओं का भव्य स्वरूप,  भ्रात प्रेम से ह्रदय व्याकुल.. संवेदनाओं की विरह पीड़ा।  मन व्यथित, ह्रदय द्रवित वन गमन, लक्ष्मण गंभीर  राम अमृत मन सुख देने वाला,भ्रात मिलन का भाव मिलन... संवेदनाओं से भरपूर तन - मन।  रामचन्द्र जी के खड़ाऊं.. पूजे जो अमृत पुंज पाऊं  अमर है, संवेदनाओं का दिव्य,संसार श्री राम,सीता लक्ष्मण भरत माताओं का व्यवहार - - -  संवेदन विहीन रावण का राक्षसी व्यवहार.. करता था जो अत्याचार..  अमर है संवेदनाऐं, नष्ट सब संवेदविहीन।।।।