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मेरे अपने

जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं  वो मेरे सामने नहीं होकर भी  मेरे पास होता है, लोग कहते हैं  यह तेरे मन का धोखा है  मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है  वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है  मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है   कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है । मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है । वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है  मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है मैं रहती धरती पर हूं  बातें आसमान की करती हूं  चलती धरा पर हूं  और नजरें ऊपर आसमान की  ओर रहती हैं । ऊपर की ओर इसलिए नहीं की स्वयं को बडा  समझती हूं ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में  क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च  ऊचांइयों में ।
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अमरंतगी

 अमरतंरगी कालातीत अटल अविचल   देवनदी ,सुरसरि शाश्वत सत्य सटीक  ,निसर्ग संजीवनी भारतवर्ष सौभाग्यम आरोग्य नाशनम मां गंगा तूभ्यम् शत-शत नमन - प्रतिज्ञ संरक्षणम अमोल सम्पदा  प्राकृतिक लावण्य  देव औषधम धन्वन्तरि जयति-जयति जयम  गंगे मैय्या की जय--  जीवन में सरलता स्वभाव मेरा तरलता मुझमें निहित स्वच्छता गुण मेरा निर्मलता क्योंकि मैं तरल हूं इसलिए मैं सरल हूं इसलिए मैं निश्चल हूं मैं प्रतिबद्ध हूं अग्रसर रहना मेरी प्रकृति शीतलता देना मेरी प्रवृति मुझमें अथाह प्रवाह है  मुझमें ऊर्जा का भंडार मुझमें जो बांधे बांध हुए ऊर्जा का संचार जीवन का अद्भुत व्यवहार देना जीवन का आधार ऊर्जा का कर दो संचार तभी दूर होगा अन्धकार सही जीवन का यही उपचार जीवन में भर लो सगुण संस्कार  कविता मात्र शब्दों का मेल नहीं वाक्यों के जोड़ - तोड़ का खेल भी नहीं कविता विचारों का प्रवाह है अन्तरात्मा की गहराई में से  समुद्र मंथन के पश्चात निकली  शुद्ध पवित्र एवम् परिपक्व विचारो के  अमूल्य रत्नों का अमृतपान है  धैर्य की पूंजी सौंदर्य की पवित्रता प्रकृति सा आभूष...

इतनी जल्दी किस लिये

मेरे अपने सदैव कहते रहे  जीवन का आनंद लो  इतनी जल्दी किस बात की  मैं हमेशा जल्दी में रहा  हर काम जल्दी में  करता रहा इतनी जल्दी  कि जिस जीवन को सुखमय  बनाने के लिए मैं जल्दी करता रहा  वह जीवन भी ढंग से नहीं जी पाया  और वह.जीवन भी निकल गया जल्दी में ..

मुमकिन

 जो आज अकेला चला है      सच की राह पर खङा है       जिद्द पर अड़ा है  भविष्य में उसके पीछे कारवा       चला है। नामुमकिन तो कुछ भी नहीं  जो हमारे दायरे से बाहर है  उसे पार करने के लिए  हदें पार कर चला है  नामुमकिन को मुमकिन  बनाने के लिए अपने आप से लडा है  दुविधाओं को पार करने की जिद्द पर अड़ा है।

प्रेम तरंग

तंरग - तरंग मोहब्बत हर रंग रंग मोहब्बत  वायुमंडल अंतर्भूत मोहब्बत  मानव डोर पतंग मोहब्बत   मोहब्बत धुरी चलायमान जग सारा  प्रकृति की उपज, प्रेम की महक  प्रेम में बसे हैं हम सब   नहीं तनिक भी प्रेम अल्पता  माखन दुग्ध आंतरिक प्रकृति  अन्वेषण कर क्षीर मध्य अनगिनत  रत्न बेसिहाब चयन कर प्रेमाअमृत  छोड़ विषाक्त द्रव्य  उद्गम ह्रदय प्रेम रसधार, प्रेम ही जीवन आधार  प्रेम से पोषित समस्त संसार,प्रेम ही सबकी खुराक।  प्रेम कश्ति प्राणी सवार 

कुछ मुलाकातें

 

पलटते पन्ने

       किताब के पन्ने           पलटते पन्ने      हर रोज एक नया पन्ना    जिन्दगी की किताब का      हर रोज एक नया पन्ना  नये दिन की शुरूआत का  सिलसिला शुरु होता है जज्बातों का  बनता है हर रोज एक नया खाता कर्मों के           हिसाब का  दिनचर्या की भागदौड़ आगे बढने की होड़  हर सुबह हर नयी भोर लिखना चाहती हूं कुछ ,लिख देती हूं कुछ  कभी-कभी परिस्थितयों देती हैं बेहद झकझोर  पिछले पन्नों की लिखावट पर जब करती हूं गौर आत्म ग्लानि से जाती हूं भर  पिछले पन्नों की लिखावट में कितनी सौम्यता थी  विचारों में कितनी सरलता थी सादगी थी  जैसे-जैसे आगे बढती गयी हो गयी कठोर  फिर सोचती हूं किताब का आरम्भ और अंत अच्छा हो तो  सब अच्छा हो जाता है  आरम्भ अच्छा था मध्य कांणा था  अब अंत को संवारना है  लौट कर घर भी तो वापिस जाना है  हिसाब किताब होगा जब वहां  अधिकतम अंको से उत्तीर्ण भी तो होना है ।