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स्वागत की परम्परा

स्वागत की परम्परा तो हम इस.कदर निभाते हैं 
की गुलाब ना भी मिले अगर राहों में बिछाने के लिए  
हम अपनी पलकों के गुलाब  बिछाते हैं।
आवभगत में तो.हम आसमान से तारे भी तोङ.लाते हैं 
आज कोई हमारा मेहमान है,
तो कल हम भी किसी के मेहमान हो सकते हैं 
स्वागत की चाह हर कोई रखता है 
फिर  हम जो चाहते हैं वो हम देना भी सीखें 
मन में जज्बा लिये कुछ कर दिखाने का 
बस कुछ ना कुछ करते रहे,करते रहे और आगे निकल गये 
करते रहे ,पर यूं ही नहीं कुछ भी करते रहे 
माना की राहें अंजानी थीं 
मन की ना मेहमान थीं 
फिर भी अतिथि सम्मान में 
स्वागत की परम्परा निभाते रहे 
खुशीयां देकर खुशियों से दामन भरते रहे 
 बेमतलब में नहीं यूं ही सफर करते रहे 
सफर में तजुर्बों से झोली भरते रहे 
नजर लक्ष्य पर थी,मन में उम्मीद थी 
मंजिलों की राहों से अंजान थे 
पर दिल में ठसक थी ,उम्मीद की किरण की चमक थी 
कहते हैं ना जहां चाह वहां राह 
बस राहों में चाहों का रंग भरते रहे 
जीवन में खुशियों के रंग भरने थे 
एक उम्मीद एक किरण 
जिसकी जुस्तजू रही जीवन भर
जो पाया बेहतरीन था,पर्याप्त था 
हम तो स्वागत की परम्परा निभा रहे थे 
दामन में हमारा भी दुआओं के तोहफे भर गया था।




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