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महादानी


प्रकृति महादानी फिर भी ना अभिमानी 
प्रकृति पर आश्रित प्रकृति पर निर्भर 
ए मनुष्य  तेरी जिन्दगानी 

प्यास बुझाता दरिया का पानी 
अन्न खेतों का जीवन प्राण हरियाली 
कहती किसानों के पसीने की कहानी..

प्रकृति से मैंने देने का गुण सीखा,
देने वाला सदा, प्रसन्न और तृप्त रहता है ।
जहाँ कहीं भी निस्वार्थ सेवा होती है
मैंने उनके खजाने स्वयमेव भरते देखे है।
वृक्षों की भाँति अपनी शरण मे आये को
फल,फूल, शीतल वायु ,देते रहो...
दरिया की भाँति निरन्तर आगे बढ़ना

जीवन के सफ़र में संग तो कुछ जाना नहीं
तो क्यों ना कुछ ऐसा कर चलें कि
हमारे जाने के बाद भी हमारे कर्मों की
खुशबू हवाओं में रहे ,कुछ ऎसे चिन्ह छोड़ते चलते
हैं ,की दुनियां हमारे चिन्हों का अनुसरण करें ।
जीवन एक सराय ,हम मुसाफ़िर
जीवन को भरपूर जियो पर अच्छे और बुरे  विवेक के संग ।।।
आओ अपने किरदार में सुन्दर रंग भरे ।
स्वयं की लिये तो सभी जीते हैं ,
हम किसी और के जीने की वजह बन जाएं
किसी के काम आ जाएं ,स्वयं के जीवन को
दूसरों के लिए प्रेरणापुंज बनाएं ।





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