जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं
वो मेरे सामने नहीं होकर भी
मेरे पास होता है, लोग कहते हैं
यह तेरे मन का धोखा है
मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है
वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है
मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है
कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है ।
मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है ।
वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है
मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है
मैं रहती धरती पर हूं
बातें आसमान की करती हूं
चलती धरा पर हूं
और नजरें ऊपर आसमान की
ओर रहती हैं ।
ऊपर की ओर इसलिए नहीं
की स्वयं को बडा समझती हूं
ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में
क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च
ऊचांइयों में ।
बहुत सुंदर कविता , जो सदैव रहता साथ चाहे सुख चाहे दुख ।
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