ए जिन्दगी जरा और ठहर
कुछ और पहर
थोङा और जी लूं जरा.
मन का कहा कुछ कर लूं जरा
कुछ और सुन लूं जरा
मनमानी सी मस्तियां कर लूं मैं भी
आज मेरे हक में है हवा चली है
दिल में मची खलबली है
फुर्सतों की घङियां मिली हैं
जुल्फों को समेट लूं मैं भी जरा
मीठी हवा की मीठी कोशिश में
चहलकदमी कर लूं मैं भी जरा सी
पंख फैलाकर आसमान की ऊचांइयों में
बन पंछी उङ लूं मैं भी मुस्करा कर
नील गगन से वसुंधरा की छवि निहारूं
प्रकृति की खूबसूरती पर वारि जाऊं
फूलों सी महक लूं मैं भी जरा सी
गुजरूं जिधर से एक हलचल मचा दूं
एक हुनर अपने में निखार लूं जरा सा
अपनी खूशबू हवाओं में बिखेर एक खूबसूरत
कहानी लिख दूं ,जो सबके दिल के करीब हो
पङे जो कहे सब ऐसे ही खुशनसीब हो ।
मैं भी जी लूँ जरा नगमे की रुह में ढलके खुशियों को चुन लूं जरा ।
ReplyDeleteवाह जी वाह
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