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Showing posts from January, 2026

परम्परा

स्वागत की परम्परा तो हम इस.कदर निभाते हैं  की गुलाब ना भी मिले अगर राहों में बिछाने के लिए   हम अपनी पलकों के कमल बिछाते हैं। आवभगत में तो.हम आसमान से तारे भी तोङ.लाते हैं  आज कोई हमारा मेहमान है, तो कल हम भी किसी के मेहमान हो सकते हैं  स्वागत की चाह हर कोई रखता है  फिर  हम जो चाहते हैं वो हम देना भी सीखें  मन में जज्बा लिये कुछ कर दिखाने का  बस कुछ ना कुछ करते रहे,करते रहे और आगे निकल गये  करते रहे ,पर यूं ही नहीं कुछ भी करते रहे  माना की राहें अंजानी थीं  मन की ना मेहमान थीं  फिर भी अतिथि सम्मान में  स्वागत की परम्परा निभाते रहे  खुशीयां देकर खुशियों से दामन भरते रहे   बेमतलब में नहीं यूं ही सफर करते रहे  सफर में तजुर्बों से झोली भरते रहे  नजर लक्ष्य पर थी,मन में उम्मीद थी  मंजिलों की राहों से अंजान थे  पर दिल में ठसक थी ,उम्मीद की किरण की चमक थी  कहते हैं ना जहां चाह वहां राह  बस राहों में चाहों का रंग भरते रहे  जीवन में खुशियों के रंग भरने थे  एक उम्मीद एक किर...

जश्न की तैयारी

जश्न की करनी है तैयारी  एकत्रित करनी है आवयशक वस्तुतऐं सारी  जश्न मना सफर कर  अंजान हैं राहें, लौटना होगा मगर  यह भी तय है  पगडंडियों की ना परवाह कर   रास्तों की उबड़-खबङ  पैरों में पत्थरों की रगङ  गम ना कर ज़ख्म यह भर जायेगें  हार -जीत की ना तू परवाह ना कर  चल निकल चल चलाचल  ऊंच-नीच की पहाङियां  समीप गहरी खाईयां  रास्ते कट जायेगें  नामुमकिन तो कुछ भी नहीं  तू खुद शहनशाह  तू स्वयं ही अपना बादशाह   सवालों को तू हल कर   बुद्धि,विवेक की कूंजियां  भीतर तेरे पूजियां  रास्तों की ना तू फिक्र कर  ऊंचें पहाड़ हो या गहरी खाईयां  काम तेरा है मंजिल तक पहुँचना  श्रेणी की  ना कर लालसा  कर्म की रख प्रधानता  जश्न मना कर ना देर कर  प्रश्नों के तू हल निकाल  जीवन बनेगा तेरा खुशहाल।  

परवरिश बाल मन की

       प्रस्तावना  आगे बढना प्रकृति का नियम है। प्रकृति एवं मनुष्य अपनी -अपनी नियति के अनुसार बढ़ते रहते है,उनका एक जीवन चक्र है जो निर्धारित समय के अनुसार चलता रहता है । *यहां हमारा विषय है *परवरिश बाल मन की*  हल्के में मत लिजिए इस परवरिश को ,बहुत ही जिम्मेदारी का काम है यह परवरिश* प्रकृति के संरक्षण के लिए परमात्मा ने स्वयं व्यवस्था की है ,मौसमों के रुप में ,वायु सूर्य मिट्टी खाद ,जल प्रकृति का पोषण करते हैं ।   आज का मंहगाई का जमाना , परिवार का खर्चा चलाना , बिजली ,पानी दुनियां भर की आधुनिक सुविधाओं की आवयशकता ,बच्चों की शिक्षा के नये-नये कार्यक्रम उसके खर्चे ,कई परिवारों में आवयशकता हो जाती है ,पति -पत्नी दोनों का घर से बाहर निकल कर काम करना ।  क्यों ना हो , सबको समानता का अधिकार जो है ।अगर सामने वाले में काबिलियत है ,तो काम करने में कोई बुराई  नहीं ।                   (  1)  सरीन परिवार शहर का एक सम्पूर्ण सम्पन्न परिवार धन -दौलत एश ओ आराम घर के सदस्यों के मुंह से एक भी मांग निकल...

मेरे अपने

जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं  वो मेरे सामने नहीं होकर भी  मेरे पास होता है, लोग कहते हैं  यह तेरे मन का धोखा है  मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है  वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है  मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है   कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है । मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है । वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है  मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है मैं रहती धरती पर हूं  बातें आसमान की करती हूं  चलती धरा पर हूं  और नजरें ऊपर आसमान की  ओर रहती हैं । ऊपर की ओर इसलिए नहीं की स्वयं को बडा  समझती हूं ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में  क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च  ऊचांइयों में ।