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परवरिश बाल मन की

       प्रस्तावना 

आगे बढना प्रकृति का नियम है।
प्रकृति एवं मनुष्य अपनी -अपनी नियति के
अनुसार बढ़ते रहते है,उनका एक जीवन चक्र है जो निर्धारित समय के अनुसार चलता रहता है ।


*यहां हमारा विषय है *परवरिश बाल मन की* 
हल्के में मत लिजिए इस परवरिश को ,बहुत ही जिम्मेदारी का काम है यह परवरिश*


प्रकृति के संरक्षण के लिए परमात्मा ने स्वयं व्यवस्था की है ,मौसमों के रुप में ,वायु सूर्य मिट्टी खाद ,जल प्रकृति का पोषण करते हैं ।

 
आज का मंहगाई का जमाना , परिवार का खर्चा चलाना , बिजली ,पानी दुनियां भर की आधुनिक सुविधाओं की आवयशकता ,बच्चों की शिक्षा के नये-नये कार्यक्रम उसके खर्चे ,कई परिवारों में आवयशकता हो जाती है ,पति -पत्नी दोनों का घर से बाहर निकल कर काम करना । 
क्यों ना हो , सबको समानता का अधिकार जो है ।अगर सामने वाले में काबिलियत है ,तो काम करने में कोई बुराई  नहीं ।
    
             (  1)

 सरीन परिवार शहर का एक सम्पूर्ण सम्पन्न परिवार धन -दौलत एश ओ आराम घर के सदस्यों के मुंह से एक भी मांग निकलने से पहले पूरी हो जाती थी । घर के बड़े बेटे का बेटा ,घर में सभी का लाडला ,दादा -दादी की आँखों का तारा ,बड़े नाजों से पल रहा था अनुभव।   दादा-दादी ,चाचा चाची सबका लाडला ,अनुभव के मम्मी -पापा अगर किसी बात डांटते या समझाने भी लगते तो ,अनुभव.दादा जी के पास जाकर बैठ जाता दादा जी भी बच्चा है अभी छोटा है कहकर अपने पोते अनुभव को बचा लेते ।

अनुभव स्वभाव से बहुत जिद्दी हो गया था । और बडों की बिल्कुल इज्जत नहीं करता था । घर के सभी सदस्य यही कहते बच्चा है ,बङा होकर सम्भल जायेगा ।

अनुभव जो पहले बच्चा था ,धीरे-धीरे किशोर अवस्था में कदम रखने लगा। भगवान की कृपा से पिता का अच्छा कारोबार था ,धन -दौलत की कोई कमी नहीं थी । 
 अनुभव की मां ,अनुभव से बेटा कहां जा रहे हो ,
अनुभव आज मम्मी आज रोहन का birthday है.वहीं जा रहा हूं ।
मां बेटा से** यह रोहन कैसा लड़का है ।
अनुभव--- अच्छा लङका है मां ...हां मां रोहन कह रहा था अगर  देर हो गयी तो मैं रात को उसके घर रूक जाऊंगा ।
मम्मी -अरे नहीं बेटा अनुभव, जल्दी कर लेना रात को किसी के यहां रूकना ठीक नहीं कोशिश करना रात को घर आ जाना । 
अनुभव अब 20 साल का हो गया था ।
लेकिन अब मां-बाप के हाथ से निकल गया था और अपनी मनमानी करने लगा था ,रात भर घर से बाहर रहना  सुबह पांच बजे घर पहुँचना,उसके लिए छोटा बङा कोई नहीं था ,बदतमीजी से बात करना मां-बाप से पैसा लूटना .ऐश करना यही आदत बन गयी थी । 
अब घर के बङे लोग कहने लगे थे ,इसकी शादी कर दो ,सुधर जायेगा ।
एक अपनी ही पहचान वाला परिवार मिला ,उनकी लङकी काफी समझदार थी ,विवाह की बात चली। लङकी अच्छी पङी -लिखी समझदार थी।  विवाह से पहले कुछ दिनों की मुलाकात के बाद लङकी ने लङके के घर वालों को करारा जवाब दिया । कहा माफ कीजिएगा ,आपका बेटा बिल्कुल ही गैर जिम्मेदार  इंसान संस्कार रहित इंसान है ,शायद इसकी परवरिश में कोई कमी रह गयी ,जिस बेटे को आप बचपन में अच्छे संस्कार देकर सम्भाल नहीं पाये उसे मेरे पल्ले बांध रहे हो, कच्ची मिट्टी को  तो आप जैसे सांचे में ढाल लो ,अब पकी मिट्टी.को आप ढोकोगे तो वो टूट जायेगी । लङके के मां-बाप दादी -दादा बहुत शर्मिंदा थे ,सोच में थे शायद हमारी परवरिश में ही कमी रह गयी।
 
         (    3 )


 परवरिश हमारा विषय है ,परवरिश बाल मन की,यूं तो बच्चे बहुत कोमल मन के होते हैं,मन में कोई वैर भेद-भाव नहीं होता उनके मन में ,बच्चों की मासूमियत और उनका भोलापन ही सबको भा जाता है ,बच्चों से मिलकर उदास मन खुश हो जाता है ।

उम्र जैसे -जैसे बङती है ,वक्त करवट लेता है ,वक्त के सांचे में उम्र ढलने लगती है ,बचपन आगे की ओर बढने लगता है।
यहां आवयशकता होती है ,अभिभावकों को, बाल मन की सही परवरिश की अगर आपने एक बालमन सुधार दिया बच्चों को अच्छे संस्कारों में ढाल दिया तो आपने एक पीढी तार दी ।


   *दूसरा अध्याय*
रीता जी एक बड़े स्कूल की प्रिसिंपल ,उनका अपना अलग ही रूतबा था ,स्कूल के सब विद्यार्थी 
 

 
 


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