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Showing posts from April, 2026

रानी राजरानी

 हां बचपन से मैं अपने मन की राजरानी हूं ,पर यह कदापि नहीं की मैंने अपने को बडा दिखाने के लिए कभी किसी को छोटा समझा हो या नीचा दिखाया हो । मैं एक संयुक्त परिवार में पली-बङी लङकी, जहां जरूरतें तो आपकी सब पूरी होती हैं ,आपके सपने भी ऊँचे-ऊंचे होते हैं,आपको सपने देखने का तो पूरा हक होता है लेकिन सपनों को पूरा करने के लिए सीमायें लांघने की अनुमति नहीं । मेरे भी सपने थे,लेकिन शहर से बाहर जाकर सीमायें लांघना यानि लक्ष्मण रेखा पार करना ,और अगर लक्ष्मण रेखा पार कर ली तो परिवार की नाक कटने के बराबर था । मैने चित्रकला में पी.एच .डी कर ली थी । लेकिन मुझे मेरी कला को अपने और अपने परिवार तक सीमित रखने की आज्ञा थी ।  मेरे सपनों के पंख आसमान की ऊंचाइयां छूने बेताब थे । कई बार कई प्रतियोगिताओं में भाग लेने के निमंत्रण आये पर अपने शहर से बाहर जाने की मुझे नहीं मिली । हमारे दादाजी हर दिन की तरह आज अपनी बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे और अखबार पङ रहे थे, अचानक मेरी मां को पास बुलाते हुये  कहा दो दिन बाद  काव्या यानि मुझे लङके वाले देखने आने वाले हैं बात पक्की होते ही वो ,जल्...

जीतना ही लक्ष्य है

 दौङने का वक्त है जीतना ही लक्ष्य है सम्भलना भी ध्येय हो चल तू पर सम्भल कर चल  भागने की होङ में त्रुटियां जो हों अगर सीख ले सबक ले  मार्गदर्शक की भूमिका बना तू बनाकर चल, हौसलों की बनाकर  ढाल प्रश्नों के तू हल निकाल उत्तरों की ना परवाह कर फार्मूलों की सही पकङ मुश्किलों की सही डगर जीत है पक्की अगर सही राह पर चला ऊंच-नीच का सफर रास्तों पर मोङ हों चेतावनी हैं भली ,प्रश्नों की खलबली तनिक सा विश्राम ले ,हल निकल ही जायेगा सम्भल कर जो तू चला दौङ में होगा भी पीछे अगर सही होगी जो तेरी पकङ जीत होगी पक्की फिर मगर विवेक से जो तू चला , कभी दौङा कभी धीमे ही चला कारवां चलता गया मंजिलों का सिलसिला जीत का होगा जश्न उम्मीद की लेकर जो तू मशाल चला 

बुद्ध होते तो युद्ध ना होता

  बुद्ध होते तो युद्ध ना होता  कारण बुद्ध को हमने मंदिरों में  पूजाघरों में सीमित कर दिया  जीवन में नहीं उतारा ,द्वंदों ने - अंहकार में अपना कद बङा कर लिया  शक्तियों का वर्चस्व चला  युद्ध  तो अवश्यभावी हो गया  निर्बल,असहाय, बलि चढे  विवेक की आंखों पर पर्दा पङ गया  युद्ध ने दस्तक दी ,विनाश का तांडव चला  अंहकार-अंहकार से टकराया मासूमियत झूलस-झूलस कर अंतहीन  दर्द की कहानी लिख रही थी  गोले ,बारूद ने शहर के शहर विनाश किये  सभ्यता को एक युग पीछे की ओर धकेल दिया  अशोका ने भी बहुत युद्ध लङे और कंलीगा बने  दर्द की आह से जब कराहा निकली ,तब आह की कोख से बुद्ध जागा विनाश की अंतहीन लीला ने मन विचलित हुआ । शक्ति युद्ध में भी थी, पर विनाश की लीला चली  अंत में शक्ति के रुप में जब बुद्ध जागा  जीत तो बुद्ध की ही हुई  .

मैं मोहब्बत हूं

मैं मोहब्बत हूं ,मैं प्रकृति प्रदत्त अद्भुत नियामत हूं  मुझसे ही संसार का अस्तित्व है  मैं मोहब्बत ना होती तो, संसार बस एक बंजर जमीन होती  मैं मोहब्बत ही तो हर रिश्ते की आत्मा हूं  भावनाओं में रहती हूं ,जज्बातों की कहानी हूं  मैं दिलों में बसती हूं, संसार को सुन्दर बनाती हूं  मैं मोहब्बत हूं ,कोई कुछ भी कहे ,मेरी जङें बहुत गहरी हैं   हंसती हूं ,गुनगुनाती हूं चेहरे पर मुस्कराहट  लिए हर गम छिपाती हूं , मैं मोहब्बत हूं हर हाल में मुस्कराती हूं  कभी - कभी दुनियां के झमेलों में उलझ जाती हूं  उदासी की चादर ओढ़े दुखी हो जाती हूं  मैं मोहब्बत हूं फिर गुनगुनाती हूं  हवाओं में ठहर रिमझिम बरसात बन जाती हूं मन के सारे द्वंद मिटा खिली.धूप बन जाती हूं  पुष्पों में सुगन्ध बन हवाओं में घुलमिल  इतराती हूं ।

जीत हार

  जीत की खुशी मिली हार से जब बहुत लङा जीतने के लिये मैं कई बाजीयां चलता रहा मुश्किलों की चुनौतियां परिक्षा समझ हल करता रहा पश्न पर प्रश्न कठिन मिले ,पर उत्तर पुस्तिका पर भरता रहा हल छिपा था वहीं खोज-बीन चलती रही सामने उत्तर प्रत्यक्ष मिला  हार के जब -जब थकता रहा परिश्रम की चमक अब मेरे व्यक्तित्व में भरी,हार भी क्या  खुश हुई जीत की जब खुशी मिली  मेरा मनोबल मुझसे क्या खूब लङा ,जीतने का जश्न मना प्रश्न भी खुश हुये क्या खूब हमें उत्तर मिले  जीत के हारा बहुत ,हार के जीता बहुत