बुद्ध होते तो युद्ध ना होता कारण बुद्ध को हमने मंदिरों में पूजाघरों में सीमित कर दिया जीवन में नहीं उतारा ,द्वंदों ने - अंहकार में अपना कद बङा कर लिया युद्ध तो अवश्यभावीथहो गया विवेक की आंखों पर पर्दा पङ गया युद्ध ने दस्तक दी ,विनाश का तांडव चला अंहकार-अंहकार से टकराया मासूमियत झूलस-झूलस कर अंतहीन दर्द की कहानी लिख रही थी गोले ,बारूद ने शहर के शहर विनाश किये सभ्यता को एक युग पीछे की ओर धकेल दिया अशोका ने भी बहुत युद्ध लङे और कंलीगा बने दर्द की आह से जब कराहा निकली ,तब आह की कोख से बुद्ध जागा विनाश की अंतहीन लीला ने मन विचलित हुआ । शक्ति युद्ध में भी थी, पर विनाश की लीला चली अंत में शक्ति के रुप में जब बुद्ध जागा जीत तो बुद्ध की ही हुई