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रानी राजरानी

 हां बचपन से मैं अपने मन की राजरानी हूं ,पर यह कदापि नहीं की मैंने अपने को बडा दिखाने के लिए कभी किसी को छोटा समझा हो या नीचा दिखाया हो ।

मैं एक संयुक्त परिवार में पली-बङी लङकी, जहां जरूरतें तो आपकी सब पूरी होती हैं ,आपके सपने भी ऊँचे-ऊंचे होते हैं,आपको सपने देखने का तो पूरा हक होता है लेकिन सपनों को पूरा करने के लिए सीमायें लांघने की अनुमति नहीं ।

मेरे भी सपने थे,लेकिन शहर से बाहर जाकर सीमायें लांघना यानि लक्ष्मण रेखा पार करना ,और अगर लक्ष्मण रेखा पार कर ली तो परिवार की नाक कटने के बराबर था ।

मैने चित्रकला में पी.एच .डी कर ली थी । लेकिन मुझे मेरी कला को अपने और अपने परिवार तक सीमित रखने की आज्ञा थी । 

मेरे सपनों के पंख आसमान की ऊंचाइयां छूने बेताब थे । कई बार कई प्रतियोगिताओं में भाग लेने के निमंत्रण आये पर अपने शहर से बाहर जाने की मुझे नहीं मिली ।

हमारे दादाजी हर दिन की तरह आज अपनी बालकनी में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे और अखबार पङ रहे थे, अचानक मेरी मां को पास बुलाते हुये  कहा दो दिन बाद  काव्या यानि मुझे लङके वाले देखने आने वाले हैं बात पक्की होते ही वो ,जल्दी ही वो मेरी शादी कर देगें ।

मेरे चित्रकारी तो अब मेरे सपनों के कैनवास में कैद होकर गयी थी ।

 फिर एक दिन सुबह दादाजी ,चाय और अखबार, फिर मेरी मां को पास बुलाते हुये ,.. काव्या को कलअच्छे से तैयार कर देना ,कल ही काव्या का रिश्ता पक्का होते ही ,उसकी शादी की तारीख तय कर देगें ।

अगले दिन  सुबह दादाजी का गुस्सा सातवें आसमान पर था ,घर के सब लोग डरे सहमें थे आखिर क्या हो गया था ,किसी को नहीं पता था । 

दादा जी अखबार टेबल पर फेंकते हुये ,हमारे परिवार की लडकियों के नाम पडोसियों को भी नहीं पता होते थे ,और रिश्तेदार तो बस गुड़िया या मुन्नी ही कहते थे ,और आज तो हमारे घर की लडकियों के नाम ---  इससे पहले की लोग हमारे घर की लडकियों के नाम और लोगों की जुबान पर आये हम सबके मुंह ही बंद कर देगें ।

दादाजी अखबार दिखाते हुए,मैं जानना चाहता हूं कि काव्या दिल्ली कब गयी ,गयी तो किसके साथ गयी ---- बहुत मशहूर कर रही है अपना और हमारा नाम  । 

काव्या बहुत डरी हुई थी ,दादाजी ,काव्या के पास आते हुये ,बहुत बङी हो गयी हो ,चोरी छुपे शहर से बाहर भी जाने लगी हो ---काव्या नजरें झुकाये हुये खङी थी --दादाजी अब तुम्हारी शादी : सब लोग हां शादी ? 

दादा जी हां शादी  ? काव्या -जी दादा जी ! दादाजी -अभी नहीं करनी शादी ,अभी चित्रकारी में आगे बढना चाहती हो ,कर लो अपने सपने पूरे ,अपने गुणों से अपना और परिवार का नाम रोशन करो ।

भर लो अपनी जिन्दगी के कैनवास में मनचाहे रंग ।

 अपने सपनों की रानी --मैं गर्व से कहती हूं ,मैं रानी हूं क्यों ना हूं ,मैं किसी रानी से कम नहीं ,और तो ओर अब मैं अपने सपनों की मालकिन और महारानी बन गयी थी  ।

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