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श्रम ही धर्म



*श्रम ही धर्म*

श्रम की अराधना

से मिटती है मुझ 

श्रमिक के जीवन 

की हर यातना 

होकर मजबूर

बनकर मजदूर   

अपनों से दूर 

जीविका की खातिर

रुख करता हूं शहरों की ओर

गांव की शांति से दूर शहरों का 

भयावह शोर, ढालता हूं स्वयं को

तपाता हूं तन को,बहलाता हूं मन को

शहरों की विशाल,भव्य इमारतों में

मुझ श्रमिक का रक्त पसीना भी चीना

जाता शहरों की प्रग्रती और समृद्धि की 

नींव मुझ जैसे अनगिनत श्रमिकों की देन है

कभी -कभी शहर की भीड़ में खो जाता हूं 

जब किसी महामारी के काल में, बैचैन, व्याकुल

पैदल ही लौट चलता हूं ,मीलों मील अपनों 

के पास अपने गांव अपने घर अपनों के बीच 

अपनत्व की चाह में ।

स्वरचित :-

ऋतु असूजा ऋषिकेश ।

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