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हृषीकेश से ऋषिकेश तक

 शाश्वत- जो सदैव से है ,जिसका ना आदि ना अंत सनातन से सृष्टि की उत्पत्ति हुई  । 

सनातन  यानि  सत्य का विस्तार 

सन-जो सत्य है तन यानि विस्तार 


जहां से सृष्टि की उत्पत्ति हुई एवं आज जो सृष्टि है वह सनातन के वंशज हैं । देश ,परिस्थिति एवं काल के अनुसार कई शाखायें बन गयीं ,मतभेद अलग-अलग हो गये ,किन्तु मूल में सबके सनातन ही है । सनातन सत्य है शाश्वत है आदि एवं अनन्त है।


पहाङों की तलहटी में बसे अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर, पर्वतों की ऊंची-ऊची चोटियां जहां संगीत गाती हैं पर्वतों की कोख से जहां पवित्र नदियों का उद्गम स्थल है । पतित पावनी अमृतमयी मां गंगा के किनारे  सघन वृक्षों की छांव में बैठकर जहां ऋषियों ने घोर तपस्या की ,उस ऋषिकेश धाम की पवित्रता अकथनीय अवर्णनीय आलौकिक है ।










हृषीकेश जिसको आम बोल-चाल की भाषा में ऋषिकेश ही कहा जाता है ।


हृषीकेश यानि इन्द्रियों के स्वामी 

रैभ्य श्रृषि की कठोर तपस्या मन और इन्द्रियों का संयम की कठोर तपस्या से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने रैभ्य ऋषि को हृषीकेश नारायण के अवतार  में दर्शन दिये ।                    

तब से भागीरथी के तट पर बसी इस घाटी का नाम हृषीकेश पङा।


देवभूमि तपस्थली हृषीकेश ----

जिसे आम बोल-चाल की भाषा में ऋषिकेश नाम से.जाना जाता है ।

ऋषिकेश ऋषियों की धरती महात्माओं की तपस्थली है।


 ऋषिकेश आश्रमों का शहर है, यहां जगह-जगह आश्रम हैं।  संन्यासी, संत ,महात्मा वैराग्य को प्राप्त साधू आदि यहां ही वास करते हैं और दैनिक दिन चर्या करते हैं ।


त्रिवेणी घाट ऋषिकेश -

  ऋषिकेश शहर  के मध्य बसा पतित पावनी मां गंगा नदी पर बसा यह घाट यहां वास करने वाली घनी आबादी के लिये मुख्य आस्था का केन्द्र है । 
त्रिवेणी घाट की भव्यता अद्भुत है साथ ही पतित पावनी भक्तों के संकट हरने मां गंगा का अमृत मयी जलधारा में डूबकी लगा मुक्ति प्राप्त कर मन को शांति प्रदान करते हैं ।


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