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मां की भूमिका

मां की भूमिका, यहां मैं भूमिका शब्द का उपयोग कर रही हूं ,क्योकि यूं  तो हर माता -पिता का फर्ज होता है अपने बच्चों की परवरिश कर उन्हें एक अच्छा इंसान बनाने का एक अंतराल के बाद मुझे लगा की 

मैने अपने जीवनकाल में सबसे अच्छे से अगर

किसी रिश्ते को निभाया है तो वो है मां की भूमिका जो मैने सबसे अच्छे से निभाई है ।

यूं तो लगभग हर माता-पिता इस रिश्ते को अच्छे से निभाते हैं, अपनी और से बेहतरीन से बेहतरीन परवरिश करते हैं ।


जब हम परिवार में रहते हैं तो हमारा एक रिश्ता नहीं होता हम कई रिश्तों में बंधे होते हैं , मां -बच्चों का रिश्ता,पिता का रिश्ता,दादा-दादी, नाना नानी, चाची ,मामा-मामी ,बुआ मौसी आदि का रिश्ता। हम हर रिश्ते का उसकी मर्यादा सम्मान और ,स्नेह से निभाते हैं।

परिवार से ही हममें संगठन,और अनुशासन की भावना जागृत होती है। 

स्त्रियां भावनात्मक रुप से सशक्त है ,इसका उदाहरण है, घर-परिवार यहां तक की समाज में भी उनकी भूमिका ।

पुरुष वर्ग की भूमिका एक सशक्त वर्ग के रूप में आती है ,जबकि वास्तव में देखा 


लेकिन जब एक लङकी मां बनती है ,तब वह अपना सर्वस्व लुटा देती है ,अपने बच्चों की परवरिश में ।

मां की खुशी उसके बच्चों से होती है। ,

मां का सौंदर्य उसके बच्चों की मुस्कराहट में होती है ।

मां और उसके बच्चे जिन बच्चों को पाल पोसकर मां बङा करती है ,उन्हें लायक बनाती है ,जीवन की दौङ में जीने के सलीके सिखाती है ,उन्हें एक जीवन साथी ढूंढकर देती है कि कल जब वो इस दुनियां में नहीं रहेगी तब उसके बच्चे अकेले ना पङ जाये ,उनका भी एक परिवार हो जिसके साथ वो दुख-सुख बांट सके ।

विडम्बना कहो या नियति ,बच्चे आगे निकल जाते हैं ,मां बाप वहीं खङे रह जाते हैं --क्या मांगते हैं मां -बाप बच्चों से बस एक अपनापन जो उन्हें सहला सके और कहे मम्मी -पापा आप अकेले नहीं हम हैं आपके साथ हैं।

जैसे मां -बाप अपने बच्चों को ऊंगली पकङकर चलना सिखाते हैं । 

वैसे ही एक उम्र के बाद मां -बाप अपने उन बच्चों की उंगली पकङ चलने को ललचाते हैं ।

यात्रा शुरू होती है, युगल जोडियों के विवाह से ,नया जीवन, नये सपने ,नयी उमंग ,नया परिवार, तालमेल बिठाते-बिठाते अपनत्व का साथ मिलता है ,तो सब अपने हो जाते हैं । 

एक लङकी के लिए  अनदेखा ,अंजाना परिवार ,कब अपना परिवार हो जाता है ,पता भी नहीं चलता ।



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