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नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में


मनचला सा दिल मेरा व्योम में था जा रुका 
नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में 
नक्षत्र सभी दमक रहे 

स्वर्णिम रुप था अजब 
राग संग रागनी 
चंचल-चपल कामिनी 
चन्द्रप्रभा बन सज्जाकर जाह्नवी रीझा रहा रही 
नैसर्गिक पूर्णिमा की रात में 
रजत आभा श्रृंगार से दमक रही सुरसरी 
तरल द्रव्य और चांदनी वर्क चढ रहा 
असीम कांति बङ रही 
निशा संग समीर भी मंद-मंद थी चल रही 
वारि लहरें मानों बह-बह के कह रही 
चल बैठ आ जरा कुछ पल तो गुजार ले 
मन वनकर मनचला खगोल के भूगोल में 
विस्मयकारी अन्वेषण करने लगा 
वसुन्धरा के श्रृंगार को 
बरस-बरस रही थी चन्द्रप्रभा 
मनचला सा दिल मेरा 
वयोम में जा रुका  
तारों की बारात सजी 
बरस-बरस रही था चन्द्र द्रव्य 
अमृतद्रव्य अंलकार देवनदी रिझा रहा 
रजत आभा कांति सुरसरी को भा रही 
निसर्ग के सौंदर्य उस पर आलौकिक एश्वर्य की 
धनिकता सर्व सम्पन्न हो रहा 
अम्बर के एश्वर्य से वसुन्धरा भी सरस रही 

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