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ऋषिकेश स्वर्णिम धरा

 

प्रकृति सम देव नहीं ..

  प्रकृति देवो भवः .. प्रकृति सम देव देव नहीं प्रकृति साक्षात देव  यत्र प्रकृति पूज्यन्ते तत्र देवता रमणयंते प्रसन्नचित्त रमते ..

विश्राम से प्रारंभ

विश्राम यानि मन को आराम   प्रारम्भ एक नई ऊर्जा के साथ   हलचल मचा दे एक ऐसा आगाज  फिर जो सजे साज हो सबके दिलों की आवाज .. आजकल मैं छुट्टी पर हूं  वक्त की पाबंद नहीं  मनमर्जी की करती हूं .. फिर भी कुछ कायदे मेरा पीछा करते हैं  मेरे चैन को बेचैन करते हैं  मुझे समय की अहमियत बताते हैं .. तुम फिर आ गये .. कहा था ना मत आना मुझे चैन से रहने दो  कुछ पल सूकून से जीने दो पर तुम  तो ना.. समय बोला मैं बहती नदिया की रफ्तार हूं  रुक जाऊं मेरा स्वभाव  नहीं  धीरे- धीरे ही सही पर रफ्तार  बनाए रखना  रुक गये तो कई  विकार जन्म ले लेगें  बहते रहोगे आगे बढते रहोगे तो भी मन को विश्राम  मिलेगा ..

रिटार्यर्मेंट नजदीक है

रिटायर्मेंट नजदीक है तुम्हारा  भावपूर्ण विदाई देगें तुम्हें .. यूं तो उम्र तुम्हारी बहुत लम्बी ही होती है .. कलयुग का प्रभाव तुम पर भी पङ गया  खिलवाड तुम संग भी हो गया  तुम्हारे भी हमशक्ल मिलने लगे बाजार  में  असली - नकली का भेद भरमा रहा  अब तुम्हारे जाने का वक्त  आ गया ..   यूं तो तुम  हम सब के बहुत  प्यारे हो  दो हजार  के नोट प्यारे हो  छोटे पैकेट बङा धमाका हो  हम सब के बहुत काम आते हो  हम सब की खुशियों की चाबी हो  एश ओ आराम हमारे हो .. पर जाने का समय आ गया है तुम्हारे  विदाई तो देनी पढेगी  कुछ  पल के मेहमान  हो  रिटार्यर्मेंट का वक्त नजदीक है तुम्हरा  कुछ खुशियां खरीद लेगें तुमसे  तुम से ली गयी निशानियों को याद  करके  तुम्हारे ना होने पर तुम्हें याद कर लेगें  खट्टे - मीठे अनुभव संजो लेंगें .. तुम रह जाते तो बात अलग होती  छोङ जाते तुम्हें अपनों के सहारे के लिए..   पर अब  तुम्हें जाना पङ रहा है  याद तो बहुत आओगे तुम.. मुश्किल सम...

अद्वैत परमानन्द

भगवान थे साधारण मानव नहीं ..इसीलिए तो मर्यादा में रहे .. समाज को प्रेरणा देनी थी ..    कुछ लोगोॅ का कहना है कि श्री राम भगवान का अवतार थे .. तो जब रावण उनकी भार्या सीता का अपहरण कर ले गया तो  श्री राम भगवान थे तो उन्होंनें तुरंत कुछ किया क्यों नहीं... क्यों  स्वयं भगवान  साधारण मनुष्य की तरह वन- वन भटकते फिरे .  श्रीराम को समाज को संदेश देना था.. क्योकि वो भगवान  थे इसीलिए  उन्होंनें कोई  भी कार्य  धर्म विरुद्ध  नियमों की सीमा तोङकर नहीं किया ..श्रीराम जी का चरित्र  आज भी और युगों -युगों से युगों- युगों तक समाज  के लिए  रामचरितमानस के रुप में प्रेरणास्रोत बन समाज  का मार्गदर्शन करता है .... भारत भूमि की दिव्यता है कि  इस दिव्य धरा पर स्वयं भगवान   शिव शंकर आदि अंनत दिव्य शक्ति जगत कल्याण हेतु जगत जननी मां पार्वती संग कैलाश पर्वत पर  गृहस्थ जीवन यापन कर संदेश  हैं ..  तब जीवन का धर्म निभाते हैं  अंहकार दक्ष का जब भंयकर अथाह मां पार्वती  का अपमान करता है शिव का रौद्र रुप आह !...

हलचल फिर शुरु हुई

व्यवस्था में सुधार हेतु कार्यक्रम चला  उठापटक हुई शुरू  कुछ हिला ,कुछ गिरा अस्त-व्यस्त सब पड़ा हुआ था  इधर- उधर सब हो रखा  था हलचल स्वाभाविक ही हो रही व्यवस्था थी चल रही   जेबों में जो कुछ था पङा .. सब कुछ छंट रहा  लगता है कुछ चल रहा है  पुराना हिसाब- किताब खुल रहा  देना - लेना अदा हो रहा  लगता है कुछ  तो व्यवस्थित  हो रहा  कुछ तो काम हो रहा  चलाचल चलाचल  हलचल भी कराकर  फिक्र बस इतनी सी कराकर   लहरों का आना -जाना रहे पर मगर  संग ना किसी को गुम करा कर .. सम्भालकर ..सम्भलकर बस जो मन चाहे वो किया कर ..

परवरिश बाल मन की.

नन्हें मुन्नों की जिन्दगी और  हमारा नजरिया ( बाल अधिकार )   निसंदेह ! इसमें कोई  दो राय नहीं कि आज जो बाल हैं .. आने वाले समय में वो देश का भविष्य होंगें ।  बाल  मन कच्ची मिट्टी के घङे के सामान ही होता है.... जैसा आकार  देगें वैसे ही बन जायेगें ...  स्वार्थ  से ऊपर उठकर  ... स्वयं की सुख सुविधाओं से ऊपर  उठकर  .. बालों को अच्छे संस्कार दें । घर परिवार  में वातावरण  साकारात्मक  रखें  ... आपसी मनमुटाव  बहस - बाजी से बचें ...  आज के बालमन पर सोशल मिडिया का भी बहुत  अधिक  प्रभाव  है ... प्रारंभ  से ही कार्टून  देखते  बच्चे भावों से रहित  होकर  कार्टून  जैसी हरकते करते हैं ... थोड़े से बङे हुये तो गैजेट्स की दुनिया हर काम  गैजेट्स  पर निर्भर  ...भावनाएं कहां से विकसित  होगीं ....हिंसात्मक ..अपराध  की दुनियां ...सोशल मिडिया पर यह सब देख- देख कर  बच्चों को कुछ भी हिंसात्मक  करना सामान्य  सा लगता है .... इस लिए घर पर अभिभा...