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हथौड़ा

 हथौड़ा भी कहां चैन से सोता है  मार - मार के चोट वो भी तो रोता है।  तोड़ - तोड़ के वो भी बहुत बिखरता है  नियति में उसके जब लिखा ही है चोट देना  तोड़ने में औरों को उसकी भी तो अपनी जड़ें हिलती हैं  दर्द किसी और का..  लहू का मर्म उसने भी सहा होगा हथौडें से टूटे टुकड़ों को जब किसी ने जोड़ा होगा  सुन्दर कलाकृति बना द्वार बनाया होगा  तब जाकर हथौड़े को चैन आया होगा   निखरने के लिए .. बिखरने के दर्द को भुलाया होगा  मरहम बन सुरक्षा द्वार का सुख पाया होगा ... ऊंचे शाश्वत देवालयों में दर्द को मरहम बनाया होगा  हथौड़ा भी कहां चैन से सोता है  मार- मार के चोट वो भी अपनी जड़ों से हिलता है ...  

हिंदी शाश्वत भाषा

  हिंदी है वीणा के तार जिस पर सुर के सजे असंख्य तार  संस्कृत से उपजी ... वेदों की भाषा हिंदी है देवों की भाषा  हिंदी ने कई युग देखे संस्कृति को परखा सभ्यताओं को संजोया  हिंदी मेरी मातृभाषा मेरी पहचान  मेरी भाषा मेरा आत्मसम्मान  मां सी ममता मिलती है  जब - जब भावों को व्यक्त किया  हिंदी अपनी मीठी भाषा  शाश्वत सनातन पवित्र भाषा  विविध परम्पराओं और संस्कृति को जिसने सांचा  संस्कृत का सरलतम व्यवहार  हिंदी ने लिया आधार  हिंदी कहे दिव्य ज्ञान की बातें  अंकित हैं हिंदी में ही वेद, ग्रन्थ उपनिषद  रामायण ,श्रीमद भागवत गीता का दिव्य पवित्रम ज्ञान  मिलता है हिनदूस्तानी होने का सम्मान  हिंदी भाषा पहचान मेरी  भावों को जिव्हा पर लाने को हिन्दी  के मुझे शब्द मिले शब्दों ने मेरे विचारों को जब गढ़ा .पंखो ने ऊंची उड़ान भरी ...  हिन्दुस्तान में जन्मी हिन्दू हिन्दुस्तानी हुई  हिंदी की जिव्हा पर चढ़ी रस धारा हिंदी मेरी दिव्य भाषा ने गद्य - पद्य में संसार को दी अमृत रसधारा  धरती पर जब तक अस्तित्व रहेग...

गणपति बप्पा मोरया

  Ritu asooja rishikesh  11 सितंबर 2022 को 8:20 pm श्री गणेश हम सब के ईष्ट हम सब के माता- पिता ..आप सब एक बार सोचकर देखिए आपके बच्चे किसी विशेष अवसर पर आपकी प्रतिमा लाकर उस पर खूब साज- सज्जा करके  बेहतरीन पुष्प सज्जा करवाकर बहुत अच्छे से कुछ दिन आपकी मूर्ति की पूजा - अर्चना कर ..पांच दिन बाद लाखों रूपए खर्च करके सिर्फ दिखावे के नाम पर .. आपकी... मेरी...   या किसी और किसी की भी मूर्ति ... या फिर हमारे ईष्ट देवी-देवताओं की मूर्ति ही क्यों ना हो ..तो सोचिए आपको कैसा लगेगा ... माफ़ करना छोटा- मुंह बड़ी बात कह दी .. मेरे शब्दों से किसी को आहत हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी ... लेकिन ज़रा सोचिए .. जागरूकता अतिआवश्यक है ... श्री गणपति जी सर्वप्रथम पूजनीय ईष्ट हैं .. उनकी मन से पूजा- अर्चना कीजिए .. अच्छा सोचिए अच्छा करिए ..और सबका भलाई के काम करते जाइए .. निःसंदेह श्री गणेश सदैव हम सब पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखेंगे ....    गणपति विसर्जन के समय गाते हैं –गणपति बप्पा मोरया , अगले बरस तू जल्दी आ ..मैं कहती हूँ हे देव अगले बरस आकर अपने भक्तों को समझाना भी कि उत्सव के...

धुएं की गुलामी

मार्डन कहलाने की लत जो लगी  धिक्कार .... शर्मसार ...गुलाम होते विचार  स्वयं का स्वयं पर ही नहीं अधिकार .... स्वयं के नाश का अंधा बाजार  झूठी गुलामी की बेड़ियां   मौत के सामान का अंधा बाजार  ना कोई अपना ना पराया  धुएं में ढूंढते खुशियों का संसार  क्या बनाओगे अपनी तकदीर  जब गिरफ्त में हो धुएं की गुलामी की जंजीर  लौट आओ ... धुएं के गुबार से वरना एक दिन आयेगा  धुएं की गिरफ्त में फंसे नौजवानों  आज तुम धुएं को स्वयं में समाते हो  कल जब धुआं तुममें  अपना घर बना लेगा  फिर कुछ ना बच पायेगा  पछतावे के सिवा कुछ भी हाथ ना आयेगा  मार्डन कहलाने का सारा भूत उतर जायेगा  धुएं में सब स्वाहा हो जायेगा ...

आधुनिकता का अंधकार

मेरी ज़िन्दगी मेरी मर्जी  वाह रे! पढ़ें लिखे मूर्खो.. गुलाम होते मूर्खो  स्वयं को समझ होशियार लेते हो धुम्रपान के नशे का आधार तुम्हारी गुलामी का इकरार ..  कमजोर मानसिकता का  झूठा ..  जहरीला ... बदनुमा ... अंधकार ..  मार्डन कहलाने की लत जो लगी है  आधी- अधूरी..आड़ी -तिरछी ,कटी- फटी पोशाकें  धुम्रपान के जहरीले धुऐं को अपनी सांसों में समाता   स्वयं को आधुनिक दर्शाने की होड़ में  स्वयं के ही मौत का मौहाल तैयार करता  गिरता- फिरता - स्वयं की चाल भी ना सम्भाल पाता  होशियार बनने का दिखावा करता ..   अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता  स्वयं की तबाही का मंजर बनाता  आंखों पर बांधे आधुनिकता की पट्टी  आज का युवा स्वयं मे जहरीले धुएं को भी समाने से   परहेज़ नहीं करता ... माने है.. जाने है.. कहे है‌.. धुम्रपान की लत  तुम्हारी गुलामी का इकरार .. कमजोर मानसिकता का  झूठा ..  जहरीला ... बदनुमा ... अंधकार .. मत कर स्वीकार नशे का अंधकार ..  कमजोर मानसिकता का  का झूठा हथियार कर रहे। स्वयं...

हवाओं में घुला हो जहर

 हवाओं में घुला हो ज़हर   तो मैं जी नहीं सकता  हां - हां मुझे फर्क पड़ता है  क्योंकि मैं इस समाज का हिस्सा हूं  मानवीय गुणों के कुछ संस्कार मुझमें भी जीते हैं  नहीं - नहीं मैं धृतराष्ट्र नहीं ... दुर्योधन मैं हो नहीं सकता  धिक्कारती है आत्मा मेरी मुझी को मैं स्वार्थ में अंधा हो नहीं सकता  जीता हूं परमार्थ के लिए.. मैं सिर्फ अपने ही लिए तो जी नहीं सकता सिर्फ अपने लिए तो मैं मर भी नहीं सकता  नहीं शौंक मुझे कुछ होने का  किसी के लिए कुछ होने से मैं स्वयं को रोक नहीं सकता  मेरी वजह से कोई आगे बढ़े तो मैं सौभाग्यशाली हूं  मैं खाली हाथ आया था ... भावों का पिटारा साथ लाया हूं  विचारों के हीरे - मोती हैं .. तराशता हूं अमूल्य रत्नों को और समाज में बिखेर देता हूं .. जौहरियों के भी मैं कम ही समझ आता हूं ... अक्सर राहों पर‌ भटकता पाया जाता हूं...  क्या करूं साधारण सा इंसान जो हूं ....

साधारण हूं इसीलिए असाधारण हूं

 कभी भी किसी को हल्के में मत लेना हर कोई भीतर एक ज्वाला लिए बैठा है  साधारण हूं इसीलिए तो असाधारण भी हूं  आज के युग में साधारण होना भी कोई आसान नहीं  साधारण हूं क्योंकि सब समझ जाते हैं  असाधारण इसलिए की सब ऊपर से देखते हैं  भीतरी की गहराई जान नहीं पाते हैं   सरल हूं ..  तरल भी हूं  देता सबको शीतलता हूं ‌‌‌‌‌‌‌ भीतर एक ज्वाला लिए बैठा हूं  मुझसे खिलवाड़...मत करना  भीतर मेरे भी है हथियार .... सरल हूं तरल हूं निश्च्छल हूं  मेरी सरलता ही मेरी पहचान है  मेरी आन -बान और शान है  मैं शाश्वत हूं क्योंकि मैं सत्य हूं  मेरे अस्तित्व से छेड़छाड़ भूल होगी तुम्हारी  छल कपट के यंत्रो की रफ्तार भले ही जोरदार  अंत जब होगा तब ना रहेगा नामोनिशान ....