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धर्म की बातें

धर्म अनन्त अथाह आकाश की गूंज धर्म  को ना जातिवाद  में ढूंढ  धर्म  परस्पर प्रेम  का आधार  सच्चा धर्म  स्वयंमेव सिद्ध चमत्कार  सेवा,दया,निस्वार्थ प्रेम परोपकार   सत्य धर्म का आधार.  धर्म  साकारात्मक  उर्जा का संसार  धर्म ना जातिवाद  में बसता  धर्म ह्दय प्रेम की मिठास   धर्म ना कोई  चमत्कार धर्म  का ना बनाओ बाजार   धर्म है ह्रदय  प्रेम  रसधार  ...

आकर्षण

 दुनियां आकर्षणों से भरी पङी है   मन को रिझाती है आंखों को आनंद  देती है  खुश रहने की खातिर मनुष्य दूर बहुत दूर तक निकल आता है  पर क्या उसे सच्ची खुशी मिलती है .. शायद  ..भीतर एक खालीपन  एक अधूरापन रह जाता है .. आगे बढता जाता है.बेहतर कुछ पाने के लिए   पीछे ना जाने क्या- क्या कीमती चीजें छोङ देता है  वैभव तो गहराई  में स्थित  बाट देखता रहता है .. बाहर नहीं भीतर है वैभव स्वयं के ही भीतर  स्वयं मालिक होकर भी अंजान  दस्तक देता है वो कई बार   बाहर नहीं भीतर  है वैभव   आंखे खुलते ही भटक जाता है मन  अटक जाता है मन संसार  के आकर्षणों में  आंखे मूंद कभी- कभी कर लिया करो भीतर  की यात्रा भी  संसार के समस्त वैभव, सुख- समृद्धि ,संतुष्टता  के खजाने  भीतर  ही मिलेंगे ... माना की आकर्षक दुनियां है हमारे लिए  .. एक पर्यटक की भांति आनंद  लेने के लिए  . बेहतरीन यादों को समेटे हुए  अपने घर लौट जाने के लिए  ...

देर से ईलाज मंहगा पङता है

काश की  पहली गलती पर  रोक लगा दी होती  काश की पहले ही ना बढने दिया होता अपराध का पहला कदम अपराध का इतना बढा साम्राज्य  पहली गलती पर रोक लगा दी होती   ना बढता अपराध का इतना बढा साम्राज्य  क्योकि कई चुप रहे ..कानों कान फुसफुसाते रहे  मुंह से बोल किसी के ना निकले   चुप्पी ने तुम्हारा तो समय निकाल दिया  तुम्हें तो निकल लिए  चुपचाप.. फर्स्ट  सटेज पर  ईलाज होता कामयाब  ना होती भीषण तबाही  लङाई होती कुछ ही से .. लेकिन अब पूरी कौरवों की सेना तैयार है  मुंह सबका काला हो रहा है अपराधो के भयावह जाल में  आगे यह लडाई बहुत मंहगी पढेगी  ईलाज की तो बात ही क्या .?  धूम्रलोचन ,मधुकैटव  सक्रिय हैं .. सत्य की मशाल जला आहुतियां मांग रहा है काल  बलि चढाने को अपराध  की स्वयं अवतरित हो आ रहे हैं महाकाल  .. खा रही हैं आने वाली पीढी को अपराध की जहरीली जङें  तुम्हारी तो कट गयी अब तोड़ो चुप्पी  बोल दिया करो समय  रहते जङों तक जहर जब फैल जाता है तो इलाज  मुश्किल होता  है .....

दुर्योधनों का अंत करो

 महाभारत का काल है   हाल  हुआ बेहाल है  दुर्योधनों की भरमार  है   कौरवो  की सभा लगी है   दुर्योधन बेअंत  धृतराष्ट्र मोह स्वच्छंद   गांधारी सम यह समाज द्रोपदी चीख चिल्ला रही  भीष्म पितामह  प्रतिज्ञाबद्ध मानों जैसे मूक बधिर  यह कैसा काल है ..हाल  हुआ बेहाल है  चीर हरण को दुर्योधन भरे पङे हैं दुशासन बेअंत..हैं कलियों को कब तक कुचलोगे  मत जहर उनमें भरो  महाभारत को ललकार रहे सत्य धर्म को सुदर्शनधारी  चक्र ऐसा चलायेगें   दुर्योधन दुशासनों के सिर  धाराशाही हो जायेंगें  मां काली करे रौद्र भंयकर  मधु केटव मारे जायेगें  रक्त बीजों अब शून्य  हो जायेगें अंत अब निश्चित है .. अनगिनत कौरवों पर  पांच पांडव भारी पढ जायेगें  एक हुंकार लगायेंगे शिव तांडव के प्रलयकाल में  समस्त  कौरव मारे जायेगें .. यही सत्य  की रीत है  .. होती सत्य  की जीत  है .. आज  के आधुनिक  समाज का हाल भी महाभारत  जैसा है ..मैं तो कहूँगी ...

पूर्णिमा का चांद हमका सबका चांद

चांद  है चांदनी है रात की रागिनी है  जल में चमकती शीतल कामिनी है  चांदी सी जल धारा कहती कोई  कहानी है  सौन्दर्य, प्रेम ,शीतलता की दुनियाभर में अनगिनत कहानियां है  ना जाने कितनों का साक्षी होगा..कस्मों का वादों का मोहब्बत के तरानों का  दास्तानों का दिवानों का .. पूर्णिमा का चांद  ए चांद चल रास्ता बता अपने जहां का  आना है तेरे जहां में अब दूर से दीदार  कर दिल नहीं भरता  इतनी शीतलता सौम्यता कहां से लाता है  अपनी चांदनी से हमको रिझाता है  मन में खूबसूरत के ख्याल लाता है   ऐसा क्या है तेरे जहां में जो हर-ओर से खूबसूरत नजर आता है  राज क्या है बता तेरे ख्याल से मन खूबसूरत सवालों से क्यों भर जाता है.. चांद  है चांदनी है रात की रागिनी है  जल में चमकती शीतल कामिनी है      

रकम

 कर्मों की गुणवत्ता परखते रहिए   उसमें कर्मठता भरते रहिए   नित - नये अनुभव के साथ    ब्याज सहित नयी रकम हासिल  होगी   रकम से ज्यादा कर्म  महत्वपूर्ण हैं   अच्छे बीज अच्छी फसल ही देगी ..  वक्त  की कसौटी पर खरे उतरते रहिए   चाल- बाजों की चाल  पर जब वक्त  की  लाठी पङती है तो ,सारी चालाकियां  जाल बनकर  चालबाज  को ही फंसा देती हैं ..

मन की बात ..

मन की बात  ..  आदरणीय प्रधानमन्त्री जी से प्रेरित  होकर  हम भी शुरू करना चाहते हैं ..आपसे आपके मन की बात  ... माना की हमारा पद उतना बङा नहीं .. परन्तु कुछ  आप और  कुछ  मैं थोङा- थोङा सब जानते हैं .. आइये--- कहिए--  आप कुछ  कहना चाहतें हैं  तो कहिए  ... हम भी कोशिश करेगें ...  आपकी समस्याओं पर चर्चा  कर उसे सुलझाने की ... सच मानिये प्रेरित हूं ..माननीय  प्रधानमंत्री  की मन की बात से ... एक छोटा सा प्रयास  ..या ऐसे कई  छोटे- छोटे प्रयास  हम भी कर सकते हैं ...  हम सबके पास कुछ  ना कुछ  विशेष  जरुर है ... तो क्यों ना हम भी अपने- अपने मन की बात कर जीवन को आसान  बनाने की कोशिश  करें ... तैयार  हूं मैं आपके मन की पढने को ... बेझिझक  कहीए.. आप पूछ सकते हैं ..सवाल .. किन्तु सवालों में अभद्रता नहीं होनी चाहिए  .... क्या है आपके मन की बात ,जी मन ही मन मत दबाइयेगा मन की बात ,कहकर तो देखिये क्या पता कोई हल निकल जाये ?