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बचपन की बादशाही

बचपन की बादशाही भी कमाल थी , फिक्र का नाम नहीं ,सपने आसमान की ऊचाईयां छूते थे ... बचपन में अपने भी जहाज, हवा में उङते थे , अपनी भी कश्तियां पानी में चलती थीं ... जब हम बच्चे थे ,दिल के बहुत ही सच्चे थे,  बादशाहों सा जीवन जीते थे जब हम बच्चे थे ... आसमान से अपने रिश्ते थे ,ऊंची- ऊंची उङाने , भरते थे ,डोर पतंग की थामें धीरे- धीरे ढील देते थे , सुदुर हवा में अपने भी संदेशे जाते थे ,जब हम बच्चे थे ... सीधे - सरल  और सच्चे थे जब हम बच्चे थे , बचपन की ठसक लङकपन ,मन को गुदगुदाता है , आता है याद बहुत  बचपन का सरल स्वभाव आज भी  बहुत  याद आता है ...... खेलों की भरमार  थी ,ऊंच - नीच खेलते थे, मन में ना कभी ऊंच -नीच के भाव आते थे .... सीढी - सांप का खेल बङा मजेदार  , सीढी चढ खुश हो जाते थे ,सांप के काटने पर  थोङा मायूस  होते थे ..फिर किस्मत अजमाते थे.... बचपन की मीठी यादें गुदगुदाती हैं  लूडो के पासे लाल,नीली पीली हरी गिट्टियों  की रंगत आज भी याद आती हैं .... बचपन को जी भर जीने दो बच्चों को , बचपन एक मीठी औषधी बन दिल को सहलाता  जीने का सबब...

अपनों की महफ़िल

महफिल हो अपनों की  तो अपनत्व का नरम एहसास  मन को खूब गुदगुदाता है .....। कुछ खट्टी - मीठी यादों का कारवां  जब निकल पङता है ..पुरानी नयी  यात्राओं पर ....  रंगत जज़्बातों के  उफ विचित्र सतरंगी इंद्रधनुष दुनियां बनाते है.. हर रंग मन को भाता है  लहरें उछल -उछल कर अपनी.बात   कहने को छलांगें लगाती हैं ... चेहरे की मीठी मुस्कान   मानों कहती हो .... हां- हां मुझे भी याद आया है  कोई सुनहरा पल मेरे दिल में भी है कुछ  .. कहने को मीठी बातें रौनक ही बढ जाती है चेहरे की .... मन की उत्सुकता खोद- खोद कर   निकाल लेती है कुछ मीठे किस्से  कुछ अद्भुत  प्यारी बातें   महफिल हो अपनों की तो  सब कुछ  अपना सा लगता है..

हे कृष्ण तुमको फिर आना होगा

हे कृष्ण, तुमको फिर आना होगा  हे कृष्ण जो ना आये तुम द्रोपदीयां  फिर निर्वस्त्र की जा रहीं दुर्योधनों की भरमार है ,कौरवों का  बेअंत अत्याचार  है  दुशासनों का अंत करो , मूक बधिर गुरु श्रेष्ठ शब्द मौन  यह कैसी हाहाकार  है.. राक्षसों का भयावह संसार  है मधुकैटव सक्रिय हो रहे,  रक्त बीज का अत्याचार है मणियों की लज्जा अपमानित   द्रोपदीयो को फिर निर्वस्त्र किया जा रहा  मणियों का चीर हरण हो रहा  हे कृष्ण अब भी जो तुम ना आये  कलयुग का हाहाकार हलाहल हो जायेगा  काल धरा को निगल जायेगा .. हे कृष्ण अब फिर समय आ गया   मणियों की लाज बचा लो तुम मणिपुर का अस्तित्व तुमसे है..अप्रासंगिक जीवों  को बाहर  निकालो तुम  हो जाने दो एक बार  फिर  महाभारत   आर्त भाव से यही पुकार  भारत की भुजायें समभालो तुम  भारत की कन्याऐं भारत की मणियां  सब तुम से ही सुरक्षित  *हे कृष्ण, फिर अवतरित हो जाओ तुम   हे कृष्ण फिर धरती पर आ जाओ तुम   द्रोपदीयों की लाज बचाओ तुम...

खेल बस तू खेल

   """"खेल तू बस खेल  हार भी जीत होगी  जब तुम तन्मयता से खेलोगे" .... खेल में खेल रहे हैं सब  खेल - खेल में खूब तमाशा  छूमंतर  हुई निराशा  मन में जागती एक नई आशा  आशा जिसकी नहीं कोई  भाषा  खेल- खेल में बढता है सौहार्द   आगे की ओर बढते कदमों का एहसास   गिर के फिर उठने की उम्मीद   सब एक दूजे को देते हैं दीद  मन में भर  उत्साह   अपना बेहतर देने की जिज्ञासा  जिसका लगा दांव वो आगे आया  प्रथम ,द्वितीय एक परम्परा जो खेला आगे बढा वो बस जीता  फिर  भी कहती हूं ना कोई  हारा ना कोई  जीता सब विजयी जो आगे बढ़कर  खेले  उम्मीदों को लगाये पंख मन में भरी नव ऊर्जा  प्रोत्साहन की चढी ऊंचाईयां  जीवन यात्रा है बस खेल का नाम  दांव - पेंच जीने के सीखो  जीवन जीना भी एक कला है  माना की उलझा - उलझा सा है सब जिसने उलझन को सुलझाया  जीवन  जीना तो उसी को आया  खेल-खेल में खेल रहे हैं सब  ना कोई हारा ना कोई जीता  विजयी हुआ वो ज...

देना सीखो

  नयी उमंग है  नयी तरंग है  नया जोश है  नये के साथ अच्छे संस्कारों को भी संग रखना   भले चाहे तुम कुछ  भी मत देना किसी को  पर किसी की दुखती रग पर प्यार  भरा हाथ  रख देना किसी भटके हुए  को सही राह दिखा देना  पर दिल ना दुखाना कभी किसी का  सच्ची सेवा हो जायेगी जब तुम  किसी के चेहरे पर. मुस्कराहट  लाने.में सफल होगे ... बेशक मत देना किसी को कीमती उपहार  किसी प्यासे को पानी पिला देना  किसी अकेलेपन से झूझते इंसान को एहसास   दिला देना कि तुम अकेले नहीं हम हैं तुम्हारे साथ हैं  ... हो जायेगी सच्ची सेवा भटके हुओं को सही राह  दिखाकर.  जीवन  को कामयाब  बनाने के गुण सिखा देना किसी को कोई  हुनर  सिखा जीने की नयी उमंग जगा देना सफल होगा जीवन    भटके हुओं को नयी राह दिखाने के लिए इंसानियत  की एक मशाल सदा जलाए रखना ...

व्यवहार

किसी भी मनुष्य की पहचान उसके व्यवहार से ही.होती है  हम व्यवहार में जन्मते हैं ,व्यवहार में जीते हैं  हमारा व्यवहार ही हमारे जीवन की रुपरेखा तैयार करता है  व्यवहार किसी भी मनुष्य का अस्तित्व होता है  व्यवहार हमारा व्यक्तित्व एवं पहचान  होता है  व्यवहार  हमारे भावों में निहित होता है व्यवहार हमारे संस्कार का दर्पण होता है  अच्छे व्यवहार की खूशबू से हमारा व्यक्तित्व निखरता है  व्यवहार को ना साधारण जानों व्यवहार   किसीभी मनुष्य का अस्तित्व  होता है  व्यवहार  कुशलता भी एक गुण है  व्यवहार  में समता,.सद्भावना हमारा  परिचय  समाज से कराता है ... व्यवहार को साधारण ना समझना  व्यवहार हमारा परिचय समाज के समक्ष रख हमारा व्यक्तित्व बतलाता है ... व्यवहार किसी भी मनुष्य के चरित्र का स्वरूप होता है ।

मेघ ,वर्षा, हरियाली

वसुन्धरा को तपता देख  मेघों ने नील गगन पर डाला डेरा  घिर- घिर आया काले घने मेघों का साया  मानों मेघ घोर गुस्साये  सूरज को ढककर बोले मेघ. वसुन्धरा बहुत तप रही है  मानों आग उगल रही है  सूरज राजा आज हम तुम्हारे आगे आयेगें  वसुन्धरा को थोङा सूकून पहुचायेगें हम वसुन्धरा क्या हाल हुआ है तुम्हारा   सूखी नदीयां सूखे पेङ पौधे वृक्ष  मेघ गरजे होकर एक  दामिनी चमकी सहमें लोग  आज मानों बरसेगें मेघ बङें जोर से  आखिर आसमान  से बरसा पानी  मानों अश्रु बहाता हो धरती मां को सूखता देख  बरसेगें आज जी भर  बरसेगें मेघ  वसुन्धरा पर फिर आयेगी हरित  क्रांति  खेतों में हरियाली होगी  वृक्षों पर लगेगें फल  रंग - बिरंगे पुष्पों  से लदेगीं  क्यारियां  महकेगें घर आंगन शीतलता का होगा एहसास  फूलों पर बैठेगी सुन्दर सुनहरी तितलियां  मनमोहक होगा चहूं और..नजारा  मेघों का वसुन्धरा से दुलार   हरियाली से निखरता है वसुन्धरा.का रुप प्यारा ..