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ऊं नमः शिवाय

ऊं नमो शिवाय ऊं नमः शिवाय   शिवमय है समस्त संसार  शिव ही जीवन का आधार  ढूंढता हूं शिव को आंखें मूंद  जबकि शिव तुझमें- मुझमें भीतर- बाहर  दिव्य ज्योत का लो आधार  शिव से होगा एकीकार   भय पर...  पाकर विजय   बना मैं अजेय ...  भय- भ्रम सब का अंत  दुविधाओं का डर नहींं   दौर अग्नि परीक्षाओं का  हुए सब खोट बाहर  शिव स्तुति उपासना का आधार  शिव शक्ति दिव्य ज्योति से जब हुआ एकीकार  मिला जीवन को सुंदर आकार  कुन्दन बना ,कोयले  की खानों  में ज्यों एक हीरा नायाब जैसे  सृष्टि कर्ता जब संग अपने ‌  जीवन के अद्भुत रंग अपने  शिव शक्ति को स्मरण कर ऊं नमो शिवाय का मंत्र रख संग अपने  ऊं नमो शिवाय ।।

अपने मालिक स्वयं बने

अपने मालिक स्वयं बने, स्वयं को प्रसन्न रखना, हमारी स्वयं की जिम्मेदारी है..किसी भी परिस्थिति को अपने ऊपर हावी ना होने दें।  परिस्थितियां तो आयेंगी - जायेंगी, हमें अपनी मन की स्थिति को मजबूत बनाना है कि वो किसी भी परिस्थिति में डगमगायें नहीं।  अपने मालिक स्वयं बने,क्यों, कहाँ, किसलिए, इसने - उसने, ऐसे-वैसे से ऊपर उठिये...  किसी ने क्या कहा, उसने ऐसा क्यो कहा, वो ऐसा क्यों करते हैं...  कोई क्या करता है, क्यों करता है,हमें इससे ऊपर उठना है..  कोई कुछ भी करता है, हमें इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए.. वो करने वाले के कर्म... वो अपने कर्म से अपना भाग्य लिख रहा है।  हम क्यों किसी के कर्म के बारे मे सोच-सोचकर अपना आज खराब करें...  हमारे विचार हमारी संपत्ति हैं क्यों इन पर नकारात्मक विचारों का  दीमक लगाए चलो कुछ अच्छा  सोंचे  कुछ अच्छा करें "।💐 👍मेरा मुझ पर विश्वास जरूरी है , मेरे हाथों की लकीरों में मेरी तकदीर सुनहरी है । मौन की भाषा जो समझ   जाते है।वो ख़ास होते हैं ।  क्योंकि ?  खामोशियों में ही अक्सर   गहरे राज होते है....

परिस्थितियां

परिस्थितियों की बात तो क्या कहिये  बड़ी ही जिद्दी, अड़ियल....  बिडम्बना तो देखो, हम भी तो कम नहीं,  परिस्थिति जो चाहती है, वो हमें मंजूर नहीं  जो हम चाहते हैं, वो परिस्थितियों को मंजूर नहीं  कभी हम परिस्थिति के अनुरूप नहीं, कभी परस्थिति हमारे अनुरूप नहीं...  परिस्थिति कभी किसी के अनुसार नहीं चलती  जब हम परिस्थितियों के अनुसार चलने लगे, परिस्थितियां के रंग बदलने, पहले हम परिस्थितियों के अनुसार चलते थे, अब परिस्थितियां कुछ  हमारे हक में होने लगी, शायद हमें भी परिस्थिति के अनुसार जीना आ गया...  परिस्थितियों को हमारे रंग में ढलना आ गया..  हमें भी चलना आ गया, जीवन जीने का ढंग आ  गया, परिस्थितियों को हमारे अनुरुप ढलना आ  गया, हमें भी हर रंग में रंगना आ गया।  परिस्थितियों संग तालमेल बिठाना आ गया। 

मेघ - मल्हार की धुन पर

                                                             प्रकृति ने मेघ-मलहार जब गाये   रोम-रोम नील-गगन का रोमांचित हो गया घूमड-घूमड बादल घिरआये....  बरसे आसमान से वर्षा की बूंदों की फुहार हरा-भरा हो  गया संसार  नाचे मन मयूर बनकर कोयल की कूक की रसभरी आवाज  वृक्षों पर पकते मीठे फलों की मिठास  वातावरण में रस घोले मधुर एहसास  वृक्षों की डालियां झूमें  पत्ता -पत्ता बजाये ढोलक की थाप  झम झमाझम वर्षा के बूंदों की आवाज  भाव-विभोर हो प्रकृत्ति करे वसुंधरा का साजो - श्रृंगार  जब-जब बरसे आसमान से वर्षा  मानों आकाश लुटाये वसुंधरा पर बेशुमार प्यार...  प्रकृति मेघ-मलहार जब गाये  अम्बर भी वसुंधरा पर जी भर अपनत्व लुटाये  वसुंधरा में हरित क्रांति ले आये  हरे-भरे वृक्ष झूम-झम लहराये  नदियां संगीत सुनायें  प्रकृति मेघ-मलहार जब गाये।।  , 

खिलौना जिन्दगी

खिलोने सी जिन्दगी,  पर खिलौना भी तो नहीं जिन्दगी  जितनी चाबी भरी है, उतनी ही चलेगी।  फिर भी स्वेच्छा से जीने का नाम है जिन्दगी  खिलौना सी जियो पर दिल ना किसी का तोड़ो माना की सबको रिझाता है खिलौना हंसता है, बोलता है, मुस्कराता है मन बहलाता है  पर भीतर एहसासों का गहरा  तूफान भी भरा होता है  जो सहलाता, कहराता है, हंसाता है, रुलाता है  पर खिलौना नहीं जिंदगी इसमें भावों का गहरा तूफान है  जो दिल को दर्द देता है.  खिलौने सी जिन्दगी पर स्वेच्छा से  जीने का वरदान, कुछ बेहतर कर दिखाने का जूनून है जिन्दगी  मनुष्य रुपी जीवन का खिलौना  दिव्य ऊर्जाओं का स्रोत है जिन्दगी  खिलौने से तन में, गहरे  एहसासों का स्रोत है जिन्दगी  दिल चीर के रख देता है जब  कोई खिलौना समझ तकलीफ देता है  तोड़ने की हद तक चला जाता है  खिलौने तन में सच्चे भावों का गहरा संमुद्र   अमूल्य रत्नों का भाव है जिन्दगी।।   

सब स्वयं में पूर्ण हैं

अपूर्णता से पूर्णता की और भटकता मानव भटकता है पूर्णता पाने के लिए  अपूर्ण जगत में खोजता है पूर्णता  पूर्णता कहां से लाये, अपूर्ण हैं सभी  बाहर खोजते - खोजते जब थक जाता है  तब शांत अवस्था में मिलता है  शांति का द्वार स्वयं के ही भीतर  अचंभित, विस्मित, फिर माया का प्रवाह  कुछ पल में फिर गुमराह   क्यों भटकता है मानव दर ब दर सब तेरे भीतर है, बाहर सब आकर्षण है माया है।  पहुंच तेरी पहले हो अपनी ओर सब कुछ मिल जायेगा। बाहर कुछ नहीं भीतर पूर्णता है   बाहर सब अपूर्ण हैं तभी तो  भटक रहें हैं, जो स्वयं अपूर्ण है वह किसी ओर को क्या पूर्ण करेगा। और स्वयं भी क्या पूर्ण होगा। सब स्वयं में पूर्ण हैं। 

प्रयत्न की कूंजी

  प्रयत्न की कूंजी से ताला   एक बार में खुल जाये यह   आवश्यक नहीं,कई बार बहुत  अधिक प्रयास करने के बाद भी  ताला नहीं खुलता..लेकिन प्रयत्न तो  हम फिर भी करते हैं.. ताला ना टूटे  सब यही चाहते हैं।  सूझ-बूझ से विवेकी बुद्धि का  उपयोग भी करना पड़ता है रोना  नहीं बहुत कुछ करना पड़ता है,  फिर भी अंधविश्वास में नहीं घिरना  होता है....  मन कई द्वन्द्व आते हैं घेरा बनाते हैं  चक्रव्यूह में फंसने नहीं निकलने  की तरकीब आनी चाहिए।