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परवरिश बाल मन की

       प्रस्तावना  आगे बढना प्रकृति का नियम है।प्रकृति एवं मनुष्य अपनी -अपनी नियति के अनुसार बढ़ते रहते है। उनका एक जीवन चक्र है जो निर्धारित समय के अनुसार चलता रहता है । *यहां हमारा विषय है *परवरिश बाल मन की*  हल्के में मत लिजिए इस परवरिश को ,बहुत ही जिम्मेदारी का काम है यह परवरिश*   परवरिश का पहला अध्याय घर -परिवेश की परवरिश से ही शुरू होता है । हमारा हिनदूस्तान सभ्यता ,संस्कृति और उच्च संस्कारों का देश है ,बच्चों के अभिवाकों को चाहिये की बाल्यकाल से ही उच्च नैतिक आदर्शों का ज्ञान दें । हमारे  पौराणिक ग्रन्थ नैतिक कहानियों की पुस्तकें पंचतंत्र की कहानियां  रामचरित्रमानस ,श्री राम सीता ,लक्ष्मण  आदि ,भागवत गीता थ्रुव ,एकलव्य महात्मा बुदध् आदि के जीवन चरित्र आदि। हमारी पीढी तो परिवार के अपने बङों श्री राम,श्री कृष्ण ध्रुव प्रहलाद आदि के जीवन चरित्रों से प्रेरणा लेकर बङी हुई है।  कौन भटकायेगा हमें हमारी राहों से ,हम श्रीराम श्री कृष्ण आदि के वंशज हैं ।  बच्चे किसको नहीं अच्छे लगते ,बच्चों की नटखट शरारतें सबको भाती हैं,क्योंकि उस...

मेरे अपने

जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं  वो मेरे सामने नहीं होकर भी  मेरे पास होता है, लोग कहते हैं  यह तेरे मन का धोखा है  मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है  वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है  मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है   कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है । मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है । वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है  मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है मैं रहती धरती पर हूं  बातें आसमान की करती हूं  चलती धरा पर हूं  और नजरें ऊपर आसमान की  ओर रहती हैं । ऊपर की ओर इसलिए नहीं की स्वयं को बडा  समझती हूं ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में  क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च  ऊचांइयों में ।

अमरंतगी

 अमरतंरगी कालातीत अटल अविचल   देवनदी ,सुरसरि शाश्वत सत्य सटीक  ,निसर्ग संजीवनी भारतवर्ष सौभाग्यम आरोग्य नाशनम मां गंगा तूभ्यम् शत-शत नमन - प्रतिज्ञ संरक्षणम अमोल सम्पदा  प्राकृतिक लावण्य  देव औषधम धन्वन्तरि जयति-जयति जयम  गंगे मैय्या की जय--  जीवन में सरलता स्वभाव मेरा तरलता मुझमें निहित स्वच्छता गुण मेरा निर्मलता क्योंकि मैं तरल हूं इसलिए मैं सरल हूं इसलिए मैं निश्चल हूं मैं प्रतिबद्ध हूं अग्रसर रहना मेरी प्रकृति शीतलता देना मेरी प्रवृति मुझमें अथाह प्रवाह है  मुझमें ऊर्जा का भंडार मुझमें जो बांधे बांध हुए ऊर्जा का संचार जीवन का अद्भुत व्यवहार देना जीवन का आधार ऊर्जा का कर दो संचार तभी दूर होगा अन्धकार सही जीवन का यही उपचार जीवन में भर लो सगुण संस्कार  कविता मात्र शब्दों का मेल नहीं वाक्यों के जोड़ - तोड़ का खेल भी नहीं कविता विचारों का प्रवाह है अन्तरात्मा की गहराई में से  समुद्र मंथन के पश्चात निकली  शुद्ध पवित्र एवम् परिपक्व विचारो के  अमूल्य रत्नों का अमृतपान है  धैर्य की पूंजी सौंदर्य की पवित्रता प्रकृति सा आभूष...

इतनी जल्दी किस लिये

मेरे अपने सदैव कहते रहे  जीवन का आनंद लो  इतनी जल्दी किस बात की  मैं हमेशा जल्दी में रहा  हर काम जल्दी में  करता रहा इतनी जल्दी  कि जिस जीवन को सुखमय  बनाने के लिए मैं जल्दी करता रहा  वह जीवन भी ढंग से नहीं जी पाया  और वह.जीवन भी निकल गया जल्दी में ..

मुमकिन

 जो नामुमकिन को मुमकिन करने की  जिद्द पर अङा है  जुनून का भार लेकर   राह पर चल पर रहा हूं  सच की राह पर खङा हूं       जिद्द पर अड़ा हूं। आज अकेला चलना बेहतर है  मुझे अपने रास्ते स्वयं बनाने हैं  भविष्य में पीछे एक कारवां चलेगा  नामुमकिन तो कुछ भी नहीं  जो हमारे दायरे से बाहर है  उसे पार करने के लिए  हदें पार करने चले हैं नामुमकिन को मुमकिन  बनाने के लिए अपने आप से लडें है  नियमों का भी पालन किया है  दुविधाओं को पार करने की जिद्द पर अड़ा हैं नामुमकिन को मुमकिन करने की जो ठानी है ।

प्रेम तरंग

तंरग - तरंग मोहब्बत हर रंग रंग मोहब्बत  वायुमंडल अंतर्भूत मोहब्बत  मानव डोर पतंग मोहब्बत   मोहब्बत धुरी चलायमान जग सारा  प्रकृति की उपज, प्रेम की महक  प्रेम में बसे हैं हम सब   नहीं तनिक भी प्रेम अल्पता  माखन दुग्ध आंतरिक प्रकृति  अन्वेषण कर क्षीर मध्य अनगिनत  रत्न बेसिहाब चयन कर प्रेमाअमृत  छोड़ विषाक्त द्रव्य  उद्गम ह्रदय प्रेम रसधार, प्रेम ही जीवन आधार  प्रेम से पोषित समस्त संसार,प्रेम ही सबकी खुराक।  प्रेम कश्ति प्राणी सवार 

कुछ मुलाकातें