Skip to main content

Posts

श्री कृष्ण जन्माषटमी उत्सव

  श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव* यशोदा के लला गपियों के गोपाल मुरलीधर , छलिया भक्तों के केशव,मनमोहन श्यामसुंदर ,माधव जिसने जिस -जिस नाम से पुकारा कृष्ण दामोदर हो गए उसके प्यारे अनन्त,अद्वितीय अलौकिक,निरांकर मुझमें ही समस्त सृष्टि का सार सुव्यवस्थित करने को सृष्टि पर आचरण और व्यवहार मुझ अद्वितीय शक्ति को पड़ता है ,धरती पर अवतार श्री राम -सीता ,राधे-कृष्ण नामों का आधार धरती पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार भादों की कृष्ण जन्माष्टमी पर पर श्रद्धा ,विश्वास ,और प्रेम से मनाया जाता है , का हो उद्धार भाद्र पद की कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है  कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार  मुबारक हो सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार........

धरती से आकाश तक का सफ़र चंद्रयान- 3

 परिचय... पात्र... बेटा नाम आकाश... पिताजी अवनीश कुमार... मां आरती देवी.... बेटा ....मां से मै बङा होकर वैज्ञानिक बनूँगा ... और चांद पर जाऊंगा ... मां ...मेरा प्यारा बेटा .... तुम्हें बहुत सारा आशीर्वाद...पहले तुम  भोजन तो कर लो ...तभी तो होशियार  बनोगे ....  बेटा नाम आकाश....  खाने से होशियार  ....मां काम को ध्यान  से करूंगा तब उस चीज की बारीकियां समझूँगा तब होशियार  बनूंगा .... मां ..नाम  आरती .... बहुत  बङा हो गया है तू ...गाङी भी तभी चलती है जब उसमें पेट्रोल डलता है.... मै जानती हूं मेरा बेटा बहुत  मेहनती और लगनशील है....  तुम्हारी दृढ इच्छा-शक्ति तुम्हे चांद  क्या अंतरिक्ष तक पहुंचायेगी .... पिता अवनीश.... बेटा तुम  अपने काम पर ध्यान  दो ...तुम्हारी मां तो तुम्हारी मां है ....इसे तो दिन - रात  बस खाना ..खाना ही पता है ... आकाश...मां बस मेरा बारहवीं का परिक्षा पत्र आ जाये फिर तो मैं श्री हरिकोटा जाऊंगा ....  मां ..आरती...हां बेटा जरूर जाना ...भगवान  का आशीर्वाद  तो बहुत  जरूरी है .......

शिक्षक जीवन वरदान

शिक्षक जीवन वरदान, अनमोल रत्न मान  अक्षर- अक्षर समझाते ज्ञान विज्ञान, शिष्य बनाये बुद्धिमान  शिक्षक समाज की नींव, मानों तन की रीढ  तोङे अंधविश्वास रूढ़ीवादिता की जंजीर  ... शिक्षक भूमिका सर्वोत्तम, कर्म यह पूजनीय  शिष्य बनते अतुलनीय.... शिक्षक भेद भाव से ऊपर ,तराशे शिष्य गोपनीय  शिक्षक द्वारा प्रेरक कहानियाँ ,प्रसंग कहावते बनते विद्यार्थियों के लिए बनती प्रेरणा स्रोत .. शिक्षक अज्ञान का अन्धकार दूर कर ,ज्ञान का प्रकाश फैलाता ।  समाज प्रगर्ति की सीढ़ियाँ चढ़ उन्नति के शिखर पर  पहुंचता। जब प्रकाश की किरणे चहुँ और फैलती , तब समाज का उद्धार होता है । बिन शिक्षक सब कुछ निर्रथक, भ्रष्ट,निर्जीव ,पशु सामान । शिक्षक की भूमिका सर्वश्रेष्ठ ,सर्वोत्तम , नव ,नूतन ,नवीन निर्माता सुव्यवस्तिथ, सुसंस्कृत ,समाज संस्थापक। बाल्यकाल में मात ,पिता शिक्षक,   शिक्षक बिना सब निरर्थक सब व्यर्थ। शिक्षक नए -नए अंकुरों में शुभ संस्कारों ,शिष्टाचार व् तकनीकी ज्ञान की खाद डालकर सुसंस्कृत सभ्य समाज की स्थापना करता ।।।।।।। 

तुलसीदास जयंति पर तुलसीदास जी को नमन

तुलसीदास जयंति पर तुलसीदास को शीश नवायें  रामचरितमानस के महात्म्य से जीवन को चरितार्थ करें  आत्म तत्व में प्रवेश कर जीवन को अमृतमय बनायें  आओ फिर से रामराज में चलें  पतित- पावन  ग्रंथों से जन- जन का उद्धार  नमन नतमस्तक नत शित बारम्बार  , गोस्वामी तुलसीदास महान  भारत की परम्परा ,भारत की विरासत   भारत  का गौरव , भारत का रक्षा कवच  भारत  के गुरु ,आचरण  की सभ्यता  नत शित बारम्बार  * रामचरितमानस* के  रचियता ...यज्ञ ,तपस्या ,भारत  का माहात्म्य  राम राज्य का चरित्र  अद्भुत वरदान   गोस्वामी तुलसीदास का सोपान  अमृत रस पान रामचरितमानस महान  भारत एक अभिमान एक संज्ञान, एक विज्ञान   भारत वासियों की साधारण  पहचान   सरल व्यवहार, मीठी वाणी ,उच्च आदर्श  भीतर  ज्ञान  का अद्भुत ज्ञान   भारत वासियों की अद्भुत अतुलनीय अद्वितीय पहचान ...

आओ सांझा चूल्हा जलाएं हम

आओ मिलजुल कर सेकें रोटियां कुछ बातों के किस्से मसाले दार  चटपटा अचार  चटनी भी पीस लेंगे  सारी फिक्र मिलजुल कर बांट लेंगे.... परन्तु सब अपनी ही रोटियां सेंक रहे हैं  पहली भूख तो सबकी दाल रोटी है  ना जाने और क्या- क्या पका रहा है मानव  चूल्हे पर कम ,मन में ज्यादा खिचङी पक रही है  खुद ही उलझा हुआ ,कैसे सुलझायेगा  किसी की फिक्र.. अपनी फिक्रों में उलझा मनुष्य  सबको अपनी ही फिक्र है  मालूम नहीं फिक्र में करता  अपना ही जीना दुरभर है  बस आगे की ओर भागता मनुष्य  जिस जीवन में जिसकी तलाश  उस उम्र  को ही दाव पर लगाता  आगे की ओर जाने की होङ में स्वयं  को पीछे धकेलता ....मानव  आओ जलाएं साझा चूल्हा  मिलजुल कर  एक कुटुम्ब बनाये हम ....

आया सावन झूम के

आया सावन झूम के  बन मयूर मन नाचे घूम- घूम के  रिम झिम वर्षा की बूंदें बन मोती  अम्बर से प्रकृति का रूप निहारें  आया सावन झूम के सखियां सजायी हाथों में मेंहदी  आकृति बनायी मनमोहिनी  रुप माधुरी चित -चोर  रुप चढा ऐसा मेंहदी का, मानों भव्य पंख हो सुन्दर मोर  मानों चंदा पर चकोर  पुष्पों पर तितलियां हो रही हों आकर्षित  हो भाव विभोर.. माथे पर बिदियां मानों अम्बर पर सितारों का जलवा  चूडियों की खनक मानों वीणा के सुर पैरों की पायल मानों संगीत की धुन पर  रियाज करता हो कोई  साज प्रकृति तुम्हारा रुप भी निखरा- निखरा है आजकल   आया है सावन झूम झूम  के  वर्षा की मधुरमयी फुहार   चहूं और बहार  ही बहार   खुशियों का संसार   सदाबहार रहे प्रकृति का रूप रहे निखरा - निखरा  मन प्रफुल्लित हो हर्षित हो तिनका भी तृण का ...

पावन मंदिर

पावन मंदिर  पवित्र स्थल  मंदिर मन के अंदर  पवित्र चिंतन  वही पवित्रता मंदिर के अंदर  हम मंदिर जाते हैं बहुत  कुछ  पाने के लिए   मन का सूकून ढूढने के लिए  मैं भी मंदिर गया  श्रद्धा  से दर पर शीश झुकाया  मन को लगा सब मिल गया  मन संतुष्ट भी हुआ परन्तु... बस कमी यहीं रह गयी  परमात्मा के दर पर जाकर हम परमात्मा से बहुत कुछ सांसारिक मांग लिया अगर हम परमात्मा में अपना मन टिका  परमात्मा का साथ ही हमेशा के लिए मांग लें तो फिर  बार- बार कुछ  मागने की जरुरत  ही ना पढेगी