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अच्छाई

 समुद्र में कंकङ भी हैं ,मोती भी हैं  कोयले की खान में कोयला भी है, हीरे भी हैं इसी तरह संसार में अच्छाई भी है ,बुराई भी हैं बुराई जो बहुतायत में दिखती है, ऐसा नहीं  अच्छाई कम है ,अच्छाई भी बहुतायत में है  किन्तु, बुराई के अंधेरे काले धुऐं के कारण  अच्छाई नजर नहीं आती ..हल्का सा धुआं  छंटा अच्छाई ही अच्छाई... बुराई  के अस्त्र प्रताड़ित करते हैं मनोबल कमजोर भी  करते हैं ...यहीं सब रहस्य छिपे हुए हैं ..सह जाओ प्रताड़ित  होकर टूटना नहीं ..काला धुआं छटते ही ,उजाला ही उजाला है ...

स्वदेश का स्वाभिमान

हम.शुद्ध स्वदेशी हैं ,हम मिट्टी के दीपक हैं, हम अंधेरे में उजाले की चमक हैं  कुम्हार के आंखों की चमक हैं ..हम कुम्हार के हाथों की मेहनत हैं ,हम.स्वदेश का स्वाभिमान हैं ..हम.मिट्टी के दीपक चकाचौंध से दूर.भीतर एक उजाला लिए बैठे होते हैं ...हममें गुरूर है.. भारत का स्वाभिमान हैं..     

त्यौहार

 त्यौहारों का मौसम !*** प्रत्येक त्यौहार स्वयं में विषेशता का प्रतीक चिन्ह समेटे हुये होते हैं ....त्यौहारों में गहरे संदेश छिपे होते हैं ....अपनी विषेशताओं के कारण त्यौहार युगों- युगों तक अपनी छाप छोङने में कामयाब  रहते हैं । संस्कृति,परम्परा और संस्कारों का संगम ....त्यौहार  परम्पराओं  के कुछ महत्वपूर्ण संस्कार... संसकारों की कुछ  आवश्यक रीतें ..जो जीवन में एक नयी राह, एक नयी,उम्मीद, नये रंग और उत्साह भर दे ....बेजोङ हैं यह परम्परायें ,यह संस्कार... त्यौहार जीवन में आनन्द और उत्साह भर देते हैं .. जीवन में नया रंग ,नया उत्साह भर एक नयी ,उर्जा भरने का काम  करते हैं त्यौहार... त्यौहार मात्र परम्परा ही नहीं....त्यौहार सत्य कथानक पर आधारित जीवन का महत्वपूर्ण आनन्द और सभ्यता को स्वयं में समेटे होते हैं ... त्यौहारों अच्छाई और सच्चाई का भी प्रतीक होते हैं ...तभी तो त्यौहारों पर तन- मन की स्वच्छता के संग अच्छे वस्त्रों घर की आंगन की साज -सज्जा का भी ध्यान रखा जाता है ... क्योंकि उन दिनों हम अपना सामीप्य महसूस करते है ...उन्हीं के स्वागत में बहुत तैयारियां की जाती...

सुनहरी भाषा

 परिचय मेरा बस यही  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा  छोटी सी डिबिया में बङी अभिलाषा  खुलते ही डिबिया निकले बङी -बङी आशा  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा  कही पर अनकही ... मौन फिर भी ... बहुत कुछ कहती अद्भुत अभिलाषा  गति सीमित, उङान भरती..फिर  थम जाती  फिर उङान भरती... दिन- प्रतिदिन उङान   विकसित  करती ...जानने को सारा जहां .. विस्मित, अचंभित, अद्भुत, अकल्पनीय  परिचय से दिव्यता को धारण करती  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा. सीमित गतिविधियों में अद्भुत गतिमान  अपनी उङान भरती मन की आशा  संकल्पों से सिद्ध करती ,ज्ञान, विज्ञान के रहस्यों  पर अपनी पैनी नजर से ,अद्भूत चमत्कार करती  दिव्य भाषा ..मन के भीतर की आलौकिक भाषा ... भाषा जो कुछ ना कहकर भी कह जाती मन की आशा  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा ...

संसार

माना की यह संसार हमारा है  जीने का आधार हमारा है  जहाज में संसार सागर के हम वृहद  की सैर करते हैं ... यह तो बहुत ही न्यारा है  दृश्य बहुत ही प्यारा है  नदियों में प्रवाहित कल- कल जल है आकाश भी सुनाता कहानी है  टिमटिम चमकते सितारे हैं  कहते कुछ जुबानी हैं  वृक्षों की ऊंची कतारें हैं , मीठे फलों का अमृत है  खेतों में अन्न की खेती है  जीविका की अद्भुत कहानी है  जीवन को सारे साधन हैं  मुस्कराने को प्रकृति प्रफुल्लित है ... महकाने को सुगन्धित पुष्प हैं पर्वतों की ऊंची चोटियों में श्वेत हिम की चादर है ..स्वर्णिम श्वेत किरणों से भव्यतम, अद्भुत दृश्यम है सोचने को सुन्दर सपने हैं  जाना की संसार हमारा है.. जीने का आधार हमारा है 

परिवर्तन

 परिवर्तन से काहे डरे ,आगे बढने को प्रयास । नव कदम आगे बङे ..होगा नये का आगाज ।। कुछ कर गुजरने को जो आगे बढा है ,होगा नये को जन्म । पतझङ पुराने पत्ते झङे ,होवे नव पल्लव का नव बंसत ।। परिवर्तन जीवन का चक्र है ,प्रगति जग की यह रीत.। परिवर्तन से कर लो प्रीत..सही दिशा होवे जग जीत ।। परिवर्तन का इतना परिचय ,नयी सोच को जन्म । नयी सोच नयी आशा, नूतन ढंग लिखे परिवर्तन की परिभाषा ।।

मन के रावण को मारा क्या?

उत्सव है, पर्व ,है खुशियों की दस्तक है  विजयादशमी का विजय का पर्व  है... प्रत्येक वर्ष रावण, मेघनाद, और कुम्भकर्ण  के बुराई रूपी पुतले जलाये जाते हैं ... सोचो ...?बुराई का पुतला जलाकर, इतनी खुशी मिलती है तो फिर क्यों ना ,मनुष्य के मन के अंदर छिपे  अंहकार रूपी रावण, ईर्ष्या, द्वेष रुपी कुम्भकर्ण  दम्भ ,क्रोध लोभ रूपी कुम्भकर्ण का अंत करें ...और  मन की सच्ची खुशी पायें  द्वापर में तो एक ही रावण था वो भी महाज्ञानी  अब कलयुग में असंख्य रावण रुपी विकार पल रहे हैं  समाज में .... अंत करना है मन के विकारों रूपी रावणों का.. पुतले फूंकने हैं ... .... अब बुराई  के पुतले ,बाहर नहीं.. भीतर  फूंकने है ,मन के भीतर ,विकारों का दाह संस्कार  कर सच्ची खुशी मनानी है .... विजय प्राप्त करनी है स्वयं के मन के ऊपर  बुरे विचारों की आहुति देकर  ..आओ विजय का  बिगुल बजायें...सच्चा हर्षोल्लास आनंद पायें ....