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बंसत पचंमी

 * बंसत पचंमी * *ऋतु बसंत,समीर चले  मधुर – मधुर सवंच्छद* नव पल्लव अंकुरित पुष्प मरकंद.. मन प्रफुल्लित सूर्य प्रकाश अद्भुत प्रसन्न अंतर्मन आयो ऋतु बसंत ज्ञानामृत बुद्धि, विवेक का भण्डार हो, मां शारदे तुमको नमन प्रकाश,ज्ञान कलश अनन्त  धन, वैभव सुख-सम्पत्ति लक्ष्मी की पवित्र – पावन रश्मियां नमों मां सरस्वती मां देवी बुद्धि, वैभव सुख-समृद्धि का प्रकाश हो.. आयो ऋतु बंसत...

जादूई रस है संगीत

जादूई रस है संगीत  वायुमंडल मे समाहित है संगीत  आओ मिलकर सुरीले गीत गायें आओ सुर से सुर मिलायें सुन्दर ताल पर सुमधुर धुन बजायें रियास की ओर कदम बढायें चलना होगा कदम से कदम मिलाकर ताल से ताल का मेल हो राग हो रागिनी हो मन में सुन्दर भावों की चांदनी हो फिर बनेगा गीत सुहाना हम सबके दिलों का तराना बने जिसका हर दिल दिवाना ऐसे गीत को है आवाज देना सुमधुर सुर हों,ताल हों सुंदर भावों का तालमेल हो जिन्दगी गाये ऐसा गीत जो हर दिल जाये जीत*।।।

मैं एक महाकाव्य बनना चाहूंगी

*मैं एक किस्सा नहीं,एक महाकाव्य बनना चाहूँगी बातें बड़ी ही सही,परन्तु सागर की स्याही, कलम मैं खुद बनना चाहूँगी * * आयी हूँ दुनियां में  तो  कुछ करके जाऊंगी सुंदर तरानों के कुछ गीत सुहाने छोड़ जाऊंगीं * *यूं ही नहीं चली जाऊंगीं परस्पर प्रेम के रंगों से सारा जहां सजाऊंगी कुछ मीठे जज्बातों से हर दिल में घर बनाऊंगी* कोई याद ना करे फिर भी  याद आऊंगीं, क्योंकि अपने तरानों के कुछ अमिट निशान छोड़ जाऊंगी * *अपने लिये तो सब जिया करते हैं मैं कुछ –कुछ दुनियां के लिये भी जीना चाहूँगी मैं किस्सा नहीं एक महाकाव्य बनना चाहूँगी मैं मेरे जाने के बाद भी, अपने शब्दों मे जीना चाहूँगी.... 

हंस लिया करो जब मन करे 🤣

यूं ही बेवजह मुस्कराया करो  माहौल को खुशनुमा बनाया करो  हंसना नहीं आता तुम्हें थोड़ा तमीज से हंसा करो जहां दखो वहाँ दांत दिखा कर हंसने लगती हो  अरे भई! हंसना तो हंसना होता है, उसमें कैसी तमीज..  यह तो देख लिया करो  कहाँ हंस रही हो..!  यह तुम्हारा घर नहीं है..  घर पर.. कौन सा हंसने  का समय मिलता.. काम व्यस्तता  फिर बचे-हुये समय में आराम..  हंसना तो मन की प्रसन्नता से आता है  किसी बात से मन खुश हुआ तो हंस लिया अब मन की प्रसन्नता पर हंसी के फूल खिलना चाहते हैं  तो उन्हें खिलने दो.. हां किसी का मजाक बनाकर हंसना  गलत है... हंसने से खुश रहने से साकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है... एक को हंसता देख दूसरा भी हंसने लगता है  हंसना तो अच्छा ही हुआ ना - -  खिलते फूलों को देखकर सबको प्रसन्नता होती है...  हंसों भई! जब मन करे जी भरकर हंस लिया करो  वैसे भी आजकल हर काम पर आधुनिकता का पैबंद लग रहा है.. हंस लो जी भर... महफिलों में ठहाके नहीं लगाये जाते.. 

मैं तो ऐसा नहीं

लहरों का काम है सारा  जो चैन से जीने नहीं देती मुझे  इसके लिए मुझे जिम्मेदार नहीं ठहराना  भीतर का कौतूहल है जो टिकने नहीं देता लहरों का आना-जाना लगा रहता है  लहरें बहुत उझाल मारती हैं  दूर तक जाकर पलट देती हैं  डर लगता है, जाने यह लहरें मुझसे  क्या चाहती.. मैं जो हूं, उससे जुदा होने के  लिये मजबूर करती हैं  अद्भुत विडम्बना तो देखो  जो पास है,उसके लिए खुश  होने की बजाय,जो पास नहीं है  उसके लिए रोने को मजबूर करती हैं ।। 

शायद मेरा दर्पण

शायद मेरा दर्पण मैला है,यह सोच मैं उसे बार-बार साफ करता रहा, दाग दर्पण में नहीं मुझमें है,यह सोच मैं घबराया, अपना चेहरा बार-बार साफ करने लगा, दाग चेहरे पर प्रतिबिंब था मेरे विचारों का-- दाग मेरे मन में था.. मैं अचंभित था..  भावों का प्रतिबिंब...!  परन्तु एक मसीहा जो हमेशा मेरे साथ चलता है,मेरा पथप्रदर्शक मेरा मार्गदर्शक है,  मुझे गुमराह होने से बचाता है! उसने मुझे समझाया.. मन के मैल को साफ करने का ध्यान उपाय बताया...  परन्तु मैं मनुष्य अपनी नादानियों से भटक जाता हूँ,  स्वयं को समझदार समझ ठोकरों पर ठोकरें खाता हूँ,  दुनियां की रंगीनियों में स्वयं को इस कदर रंग लेता हूं,कि अभद्र हो जाता हूँ, फिर दर्पण देख पछताता हूं,और रोता हूँ..  फिर लौटकर मसीहा के पास जाता हूँ,  और उस परमपिता परमात्मा के आगे शीश झुकाता हूं, उस पर अपनी नादानियों के इल्जाम परमपिता पिता पर लगाता हूं..  वह परमपिता परमात्मा हम सबकी गलतियां माफ करता है...  वह मसीहा हम सबकी आत्मा में बैठा परमपिता परमात्मा है।।     परन्तु एक मसीहा जो हमेशा मेरे साथ चलता है , मुझे ...

राममय हुई धरती सारी

राममय हुई धरती सारी  हर्षित हैं खग, मृग, नर- नारी  महा उत्सव की करो तैयारी  आरती थाल करो तैयार  श्री राम आयेगें हमारे द्वार  मिष्ठानों के भोग बनाओ  दीप जलाओ घर - द्वार  जगमग- जगमग हो संसार  राम आये हैं अयोध्या धाम  शंखनाद से करो आगाज  स्वागत का करो ऐलान   युगों - युगों के बाद हैं लौटे राम अयोध्या धाम हैं आयें राममय हुआ समस्त संसार.... रामराज की हो जय-जयकार सतयुग सम होगा समस्त संसार  रामराज की जय - जयकार