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खुशी

अपनी खुशियों की चाबी अपने संग रखना किसी ओर के हाथ मत देना..   अपनी खुशियों के मालिक स्वयं बने रहना।  खुशी जीवन का सुन्दरतम श्रृंगार है, खुशी अपनत्व का मीठा एहसास है।  खुशी मन का भी सौंदर्य है। खुशियों की चाबी बाहर नहीं  मन के भीतर छिपी होती है, चाबी को ढूढकर, खुशियाँ खोज लाना यही तो जीवन का आधार है।  फिर क्यों ढूढते हो खुशी को इधर-उधर खुश रहने का मंत्र तो आपके पास है। नहीं निर्भर हमारी खुशी किसी पर  हम तो खुद खुशी का पर्याय हैं  हमें देख लोग बिन बात मुस्करा जाते हैं। प्रकृति से मिला सुन्दरतम उपहार है। 

भ्रम

भ्रम में जी रहे हैं सभी बिन बात का भ्रम ,  डर का भ्रम , भ्रम ही भ्रम में  उलझनों का भ्रम  अनहोनी का भ्रम  धोखे का भ्रम  झूठ का भ्रम  अपवाद का भ्रम  निंदा का भ्रम  द्वेष का भ्रम  षड्यंत्र का भ्रम  भ्रम से खत्म हुआ, जीवन का आनन्द ।  भ्रम एक मायाजाल,मन का कोलाहल  भ्रम जागती आंखों का दु:स्वप्न  भ्रम एक नाकारात्मकता सोच..  भ्रम हर लेता मन की शुभ सोच..  भ्रम के अंधेरे से बाहर निकलो  तभी होगा साकारात्मक सोच का सवेरा  भ्रम है रात का अंधेरा,   भ्रम की नींद से जागो तभी होगा  साकारात्मक सोच का सवेरा।। 

मेहरबानी

मेहरबानी मांगनी है, तो परमात्मा प्रेम से मांगों  परमात्मा के आशीर्वाद की मांगों.. उसी की मेहर से  ही है यह धरती,यह आसमां....  मेहरबानीयों का मंजर, उसकी अथाह है    प्रकृति बिना किसी भेदभाव के सबको दे रही है।  हम तो बस रोते रह गये, सामने दरिया था  फिर भी प्यासे रह गये।  मेहरबानी तो स्वयं पर स्वयं की करनी है, विवेक से जीवन की गुत्थियां सुलझानी है।  मेहरबानी ही तो उसकी है,की हम सक्षम हैं,  हम सवंचछ हैं, हम बुद्धि, बल, विवेक से भरपूर हैं  दिया ऊपर वाले ने जी भर के दिया है,  हमें लेना ही नहीं आया तो वो क्या करे।।  थोङा प्रयास करना है, समक्ष खजाने भरे पड़े हैं,  उपयोग करने की विधि सीखनी है, वो सदा से ही  मेहरबान था, मेहरबान रहेगा, उसकी मेहरबानीयों  का सिलसिला सदा यूं ही चलता रहेगा। 

खिल रही चेहरे की कली

यूं ही बेवजह मुस्कराया करो माहौल को खुशनुमा बनाया करो जिन्दगी आपकी अपनी है इसे ना शिकवे शिकायतों में जाया करो..  गीत खुशी के गा रहा है कोई शायर हो गया है       दिल दिवाना हो गया है मन मस्ताना हो गया है।  ख्वाब जो मन में पले, क्या वो सच हो रहे,            देख तेरे चेहरे की खुशी, माहौल भी इतरा रहा।।  हवाओं में तू उड़ रहा, बादलों सा घिर रहा,      आज फिर नयी कहानी कहने को तू बहक रहा।। खिल रही चेहरे की कली, चर्चा है यह गली -गली  राज कुछ मन में छिपा, चेहरा तेरा बतला रहा।। चहक रहा,बहक रहा, पांव जमीं पर ना धर रहा, चल उड़ चले नये जहां मे,मोहब्बत का हो जहां आसमां।। मोहब्बत का हो जहां नया आसमां।।  चांद -तारों पर लिखेगें, मोहब्बत की नयी दास्तान आसमां से नूर बरसे, प्रेम हो जहां दिलों में भरा।- 2

चहत सबकी मोहब्बत

चाहत सबकी मोहब्बत है, फिर भी..  ना जाने क्यों नफरत की पगडंडियाँ बनाते हैं। अपनों से ही मोहब्बत है.. जाने कहाँ से गलतफहमियां ढूढ लाते हैं। जीवन की कश्ती में,अंहकार का चापू चलाते हैं। स्वार्थ में अंधों की तरह अकेले ही महल बनाते हैं, और महल की दिवारों से अकेले ही बातें करते हैं।  फिर घबराकर जमाने में लौट आते हैं  और अकेलेपन का गान गाते हैं।  मंजिल सबकी एक है, चाहत सबकी एक है ,  चलो फिर हंस के रास्ते काटते हैं,  कुछ गीत गुनगुनाते हैं, कुछ ठहाके लगाते हैं।  जीने के खूबसूरत अंदाज बनाते हैं  जमाने को परस्पर प्रेम का पाठ पढाते हैं।  तेरे-मेरे की दूरियां मिटाते हैं  स्वार्थ को भूल जाते हैं,  परमात्मा नहीं किसी को कम-या  किसी को अधिक देता, प्रकृति से यह बात सीख जाते हैं,  नदियाँ, सागर, वृक्ष, खेत-खलिहान  सभी तो एक सामान सबकी क्षुधा मिटाते हैं  चाहत सबकी मोहब्बत है  चलो फलदार वृक्ष लगाते हैं,  प्रेम के दरिया से जीवन को रसमय बनाते हें। 

संवेदनाओं का क्रंदन

मानव मन की सुन्दर कोमल  भावनाओं का दाह संस्कार होते देख  मेरी संवेदनाऐं जागृत हो ह्रदय रुदन करने लगीं आततायी संवेदन शून्य हो,  भावन रहित हो गये थे.. क्रूरता पशुता  राक्षस वृति को अपनाकर , आंतक  का घिनौना गंदा खेल रहे थे  घायल हुये थे कुछ लोग,  कुछ इस दुनिया से चले गये थे,  एक बार फिर तहलका मचा था मर गयी थी,करूणा, दया,संवेदना  मची थी तबाही,सब कुछ अस्त -व्यस्त था सब सहमें हुये से डरे हुये थे  बच्चे घरों में कैद थे,घरों में सन्नाटा पसरा हुआ था, हर कोई भयभीत था  मनुष्य के भीतर पशुता, राक्षसवृत्ति जन्म ले  अत्याचार पर अत्याचार कर रही थी   मां की ममता कराह रही थी, दुहाई दे रही थी  उस मां की जो जगतजननी है, सबकी मां है..  कह रही थी मनुष्य जाति का मान रख..  निसर्ग से प्राप्त कोमल संवेदनाओं का  क्रन्दन मचा रहा है तबाही... अंहकार  किस बात का अंत तो सबका एक ही है। 

नयी - नवेली

 समय की रफ्तार के साथ  मैं भी बह गयी, रोकना चाहा पर जल की धारा थी आगे की  ओर बहने लगी।  बहना मेरा स्वभाव है, बहुत कुछ समाया स्वयं में  पर कुछ ना एकत्र किया  जब-जब हलचल हुई  सब किनारे पर लगाती गयी वक की रफ्तार के साथ बहती चली गयी, हर दिन नूतन नवेली पर समय की रफ्तार के साथ मैं बहती रही  रुकी नहीं, रुकती तो बासी हो जाती विकार उत्पन्न हो जाते मुझमें  मैं बदली नहीं, हर दिन नयी नवेली आगे की और बढती जल धारा की तरह...