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मेरा जन्म

धरती मां की गोद में आराम  से सोयी थी  बढना प्रकृति का नियम है  जिस दिन नन्हीं कली बनकर  खिली  बागवान  की आंखो में चमक थी  परवरिश को मेरी कोई  ना कमी छोङी थी  सूर्य का ओज बागवान  का समर्पण   प्रकृति ने मुझे  बेहतरीन  रंगों की सौगात  बख्शी  मैं पुष्प  बनकर  खिली ..बागों की और  सबकी नजर रुकीं  बागों में आकर्षक पुष्प  खिले थे..प्रकृति के करिश्मों पर  सब मन्त्रमुग्ध थे ..आकाश  की छत  मिट्टी की गोद   सूर्य की ओजस्वता  ..जल की निर्मलता ,शीतलता .. तेज हवाओं की लहर से भी खूब  लङी थी  आंधी - तूफानों का दौर  भी देखा .. फिर भी मैं खुश हूं अपने इस छोटे से जीवन मे .. मैं पुष्प  मन की मधुरता का पर्याय बना .. बागों की रौनक बन ..हवाओं में इत्र बनकर बहा सफल है जीवन  मेरा ..खुशी हो या गम  ..हर जगह  सजा ...महत्वपूर्ण  स्थान मिला ..

शब्द बने व्यक्तित्व की पहचान

शब्द बने व्यक्तित्व की पहचान   शब्द तपस्या, विचार हवन  सरल, मधुर, सहज भावों की  पवित्र अग्नि..शुभ साकारात्मक वातावरण  ह्रदय बहे निर्मल पवित्र भाव रस धारा ..  रस -रसायन पावन -पवित्र आशीष सम्मान    शब्द  प्रवाह  ध्वनि आकार   शब्द  सजाओ, शब्द संवारों इन्हीं से रचता- बसता संवरता  यह सुन्दर संसार  ... शब्द महिमा मन का प्राणायाम   शब्दों का करना सदा सम्मान   शब्दों का ना करना कोलाहल   शब्दों ने समाहित  सारे हल  शब्द बनकर  ढाल  हर दुविधा का  निकाले हल ... शब्द अराधना शब्द  तपस्या  शब्दों का जीवन  में बङा ही मोल ...

अथाह आलौकिक दिव्यता

"अथाह आलौकिक निर्मल मन की पवित्रता  धर्म  मनुष्य  की सौम्यता सच्चा धर्म ना भटकाये कभी  सर्व जन हिताय कर्म  निभाए सदा" धर्म  का ना बाजार बनाओ  धर्म के नाम पर ना भटकाओ  धर्म के नाम पर  ना डराओ  धर्म  के नाम पर ना समाज को गुमराह करो  धर्म  के नाम  पर  अपनी शक्तियों का दुरुपयोग ना करें  शक्तियां देवों में भी होती हैं, दैत्यों में भी होती है  प्रकृति भी उन्हीं का साथ देती है ,जो सत्य का मार्ग बताये सत्य मार्ग  चले  श्रीराम  श्रीकृष्ण जीवन जीना की कला  एवं मर्यादित जीवन  जीने का संदेश  देते हैं धर्म का पर्याय तो प्रहलाद. ध्रुव  राम ,कृष्ण आदि हैं और अनादि काल  तक  रहेगें ..शक्तियां तो राम में भी थीं.. रावण में भी थीं कंस में भी थी ,हिरणयकश्यप में भी थीं ... शक्तियों  का उचित  उपयोग आपको महान  बनाता है.. धर्म  अद्वितीय शिक्षा,  उच्चतम दीक्षा.. धर्म यही शिक्षित हों सभी निरोगी हों सभी  कमतर  ना कोई  भीतर एक भाव जगा  जागृत क...

संतोष का धन

जाने क्या पाना चाहता है यह मन  ना खुद चैन से रहता है ना मुझे  रहने देता है .. भटकाता रहता है  हर पल ..अपने दायरों से बाहर   निकल कर ऊंची- ऊंची उङाने भरता है  जो मुमकिन नहीं.. उसे मुमकिन कर गुजरने  की जिद्द  मेरी नहीं..मेरे मन की है .. समुंद्र में उठती लहरों की तरह उछल- उछल कर   अपने संग जाने क्या- क्या बहा ले जाना चाहता है  नहीं लेने का नहीं देने का शौक रखता है मेरा मन  ऐसा क्या करूं जो सबको खुशी दे पाऊं  सबके लिए  बेहतर से भी बेहतरीन  हो  कुछ  कर गुजरने की जिद्द ना जाने  मुझे कहां ले जाये .. सीमाऐं तो बढाने पङेगीं  दायरों से बाहर  निकल  कर  एक नया कारवां  चलाना होगा .. जन्म लिया है तो जीना तो होगा ही  पर सामंजस्य  बिठाकर  तुला की नोंक पर संतुलित  फलदार  वृक्ष  की भांति सदैव  हरे- भरे रहने और   निरंतर  कुछ  ना कुछ  देते रहने का भाव  देकर   भेजा है भगवान  तो भरपूर  कर दो मुझे संतोष  के ...

पर्वतों की पुकार

पर्वतों से ही वसुंधरा का श्रृंगार   पर्वत जल औषधी एवं वनस्पतियों का भण्डार  पर्वत उच्चतम विशालकाय दीवार  प्राकृतिक आपदाओं एवं शत्रुओं के समक्ष ढाल .. प्रकृति की दिव्य सम्पदा पर्वत  पर्वतों ने आंचल में अपने निज निवास को स्थान दिया  कृतार्थ  हो नमन तुम करते  पूजकर संरक्षण भी करते  चीर दिया सीना गिरी का  बेइंतहा निर्माण  किया  कतरा - कतरा बिखर रहे पर्वत  स्वार्थ में पर्वतों का कत्ल ए आम किया  अडिग धरा हलाहल करती आसन अपने से डगमगा गयी  चित्कार रही ..गोद मेरी मनुष्य  तुमहें समर्पित  प्रसन्नचित्त पालित पोषित हुये तुम  सुख समृद्धि का साम्राज्य बसाया  दुलार मेरे का लाभ उठाया, लोभ का साम्राज्य बढाया गोद मेरी लहूलुहान हुई ,सहनशीलता अब नष्ट  हुई ... पर्वत अब पुकार रहे दर्द से कराह रहे  स्वार्थ में बढाकर बोझ पर्वतों पर कर दिये अत्याचार बेखौफ   रोक मानव अब भी रोक ..विनाश को अपने ना कर अंधी दौङ . सम्भल जरा तू देख पर्वत प्रकृति का सौन्दर्य हैं पर्वत ... हिमगिरि जल का स्रोत.. जङी- बूटियां ...

हिंदी मेरी मातृ भाषा गर्व से कहती हूं..

परिचिता :-  विदेश से लौटी  मेरी एक परिचिता ... अग्रेजी में पटर- पटर करती .. अपने आप को नये जमाने की आधुनिक  समझती ...  मुझे भी अंग्रेजी में बोलने के लिए  प्रेरित करती । कहती जीवन  में आगे बढना है तो अंग्रेजी बोलना सीख ले । बताओ --? यह भी कोई बात हुई  ... मैने भी कह दिया ना भई ना ..."हिन्दुस्तान में जन्मी.. पहचान मेरी हिन्दी" "हिंदी मेरी मात्र भाषा मेरा सम्मान मां तुल्य पूजनीय है" ... *हिंदी मुझे विरासत में मिली है* ... मेरे माता - पिता दादी- दादा सभी आपस में हिंदी में ही बात करते आये हैं ... और  मेरी दादी तो बचपन से मुझे हिंदी की ही पुस्तकें पढ कर नैतिक  शिक्षाप्रद  कहानियां सुनाती थीं.. उन कहानियों के छाया चित्र आज भी मेरे मानस पटल पर अपनी अद्वितीय  छाप बनाये हुए हैं..  मेरा मार्गदर्शन करते हैं ..  पंचतंत्र की  कहानियां की विषेशताओं से कोई  भी भारतीय  अनभिज्ञ  नहीं ..  रामचरितमानस  .. भागवत गीता .,महाभारत  .. चारों वेद ,उपनिषद  ... विश्व पटल पर अपना लोहा मनवाने में समक्ष हैं। क्योकि...

कोहरे का संदेश

 ओढ कर  कोहरे की श्वेत  मखमली चादर  धरा ..आकाश कहीं गुम हुए  राहें नही आती नजर..  जाना है पर.. सफर पर .. धीमे- धीमे बढाने होगें कदम   बैठा है कोहरा राह  घेरकर  चलना होगा सम्भलकर  दिख रहा है कुछ कम -कम ना डर  सरक रही कम - कम मगर  ओढ़नी से झाँककर  भानू की किरणें उधर  दूर आकाश से आ रहा उजाला है तो  पर जरा सी देर से ... हट जायेगा कोहरा मगर.. सम्भल ... जल्द बाजी ना कर.. गम ना कर देर  देर हो थोडी अगर  ...