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सुनहरी भाषा

 परिचय मेरा बस यही  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा  छोटी सी डिबिया में बङी अभिलाषा  खुलते ही डिबिया निकले बङी -बङी आशा  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा  कही पर अनकही ... मौन फिर भी ... बहुत कुछ कहती अद्भुत अभिलाषा  गति सीमित, उङान भरती..फिर  थम जाती  फिर उङान भरती... दिन- प्रतिदिन उङान   विकसित  करती ...जानने को सारा जहां .. विस्मित, अचंभित, अद्भुत, अकल्पनीय  परिचय से दिव्यता को धारण करती  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा. सीमित गतिविधियों में अद्भुत गतिमान  अपनी उङान भरती मन की आशा  संकल्पों से सिद्ध करती ,ज्ञान, विज्ञान के रहस्यों  पर अपनी पैनी नजर से ,अद्भूत चमत्कार करती  दिव्य भाषा ..मन के भीतर की आलौकिक भाषा ... भाषा जो कुछ ना कहकर भी कह जाती मन की आशा  निशब्द, शब्दों की सुनहरी भाषा ...

संसार

माना की यह संसार हमारा है  जीने का आधार हमारा है  जहाज में संसार सागर के हम वृहद  की सैर करते हैं ... यह तो बहुत ही न्यारा है  दृश्य बहुत ही प्यारा है  नदियों में प्रवाहित कल- कल जल है आकाश भी सुनाता कहानी है  टिमटिम चमकते सितारे हैं  कहते कुछ जुबानी हैं  वृक्षों की ऊंची कतारें हैं , मीठे फलों का अमृत है  खेतों में अन्न की खेती है  जीविका की अद्भुत कहानी है  जीवन को सारे साधन हैं  मुस्कराने को प्रकृति प्रफुल्लित है ... महकाने को सुगन्धित पुष्प हैं पर्वतों की ऊंची चोटियों में श्वेत हिम की चादर है ..स्वर्णिम श्वेत किरणों से भव्यतम, अद्भुत दृश्यम है सोचने को सुन्दर सपने हैं  जाना की संसार हमारा है.. जीने का आधार हमारा है 

परिवर्तन

 परिवर्तन से काहे डरे ,आगे बढने को प्रयास । नव कदम आगे बङे ..होगा नये का आगाज ।। कुछ कर गुजरने को जो आगे बढा है ,होगा नये को जन्म । पतझङ पुराने पत्ते झङे ,होवे नव पल्लव का नव बंसत ।। परिवर्तन जीवन का चक्र है ,प्रगति जग की यह रीत.। परिवर्तन से कर लो प्रीत..सही दिशा होवे जग जीत ।। परिवर्तन का इतना परिचय ,नयी सोच को जन्म । नयी सोच नयी आशा, नूतन ढंग लिखे परिवर्तन की परिभाषा ।।

मन के रावण को मारा क्या?

उत्सव है, पर्व ,है खुशियों की दस्तक है  विजयादशमी का विजय का पर्व  है... प्रत्येक वर्ष रावण, मेघनाद, और कुम्भकर्ण  के बुराई रूपी पुतले जलाये जाते हैं ... सोचो ...?बुराई का पुतला जलाकर, इतनी खुशी मिलती है तो फिर क्यों ना ,मनुष्य के मन के अंदर छिपे  अंहकार रूपी रावण, ईर्ष्या, द्वेष रुपी कुम्भकर्ण  दम्भ ,क्रोध लोभ रूपी कुम्भकर्ण का अंत करें ...और  मन की सच्ची खुशी पायें  द्वापर में तो एक ही रावण था वो भी महाज्ञानी  अब कलयुग में असंख्य रावण रुपी विकार पल रहे हैं  समाज में .... अंत करना है मन के विकारों रूपी रावणों का.. पुतले फूंकने हैं ... .... अब बुराई  के पुतले ,बाहर नहीं.. भीतर  फूंकने है ,मन के भीतर ,विकारों का दाह संस्कार  कर सच्ची खुशी मनानी है .... विजय प्राप्त करनी है स्वयं के मन के ऊपर  बुरे विचारों की आहुति देकर  ..आओ विजय का  बिगुल बजायें...सच्चा हर्षोल्लास आनंद पायें ....

मां जगदम्बा

मां जगदम्बा ,मां अम्बा  मां मनसा देवी ,मां शाकम्भरी  द्वार सजा ..पंडाल सजा है माता के जयकारों से भव्य महौल बना है माता रानी के नवरात्रे आये  भर-भर खुशियां माता लायी   घर- घर गूंजी मां की महिमा  नव रुपों में मां सज- धज आयी  महिमा मां की अपरम्पार  घर- द्वार सजे ,बंदनवार खुशियों का द्वार  रंगोली का रंग पक्का, मां को भाये दिल का सच्चा मां जगदम्बा ,मां सरस्वती ,मां लक्षमी ,मां काली कालरूपा  मां ही तो है सृष्टि की रचना मां में ही है सुख- समृद्धि का संचार  मां ही है रिद्धि- सिद्धि का आधार  मां को मनाओ घर सुख - समृद्धि वैभव लाओ ..

दोस्ती

पापा:-अपने बेटे से .. स्कूल से घर ले जाते वक्त.... मंयक बेटा ..उदास क्यों हो ..क्या चाहिए तुम्हें .. कोई टाय चाहिए.. चाकलेट चाहिए... मयंक:- पापा चाकलेट तो घर में बहुत सारी पङी है ...आप भूल गये ..आप कल ही तो लाये थे .... पापा :- हां याद है बेटा ,तुम चुपचाप बैठे थे ना इसलिए..पूछ  लिया ... मयंक :- पापा मैं अकेले कितनी चॉकलेट खाऊंगा...मेरा कोई दोस्त भी नहीं है ...    पापा :- गाङी चलाने में ध्यान  केंद्रित करते हुए  ... फिर बोलते हुये ..मैं हूं ना तुम्हारा दोस्त ... हां पापा वो तो आप हो .पर आपको तो आफिस भी जाना पङता है .... बेटा तुम  स्कूल की लाईन में सबसे पीछे क्यों खङे होते हो .. मंयक :- पापा सब बच्चे भाग- भागकर आगे खङे हो जाते हैं और मैं पीछे रह जाता हूं  मयंक :- कुछ सोचते हुये ..पापा आप ना.मुझे साईकिल दिला दो ... पापा:- ठीक है बेटा ... मयंक :- पर. पापा मैं साईकिल किसके साथ चलाऊगा  ...मेरा कोई दोस्त भी तो नहीं है ... पापा:- मयंक बेटा ..मैने तुम्हें कितनी बार कहा है ..अपनी जगह खुद बनानी पङती है .... मयंक:- पापा वो जो है ना सिद्धांत है ,वो मेरा दोस्त ...

स्वप्न

 मन के अंदर भी बैठा होता है एक मन  एक जागृत अवस्था का मन, दूसरा स्वप्न अवस्था का मन  एक नयी ही दुनियां बसा लेता है ,ख्वाबों की दुनियां में मन  जागृत परिस्थति के आयाम पर स्वयं  ही सपने बुनता है .. निद्रा अवस्था में  मन के भीतर बैठा मन जो सुस्त अवस्था में  जागृत हो अपना ही कारवां तैयार  कर लेता है  स्वप्न बनकर घटनास्थल से कुछ भी चुन लेता है  और सपनों के रूप में साकार होता है  मन की गहराई का कोई तोङं नहीं  क्षमता अनुसार  ही जान पाता है मनुष्य  थोङा बहुत भी भीतर की यात्रा की हो तो  बहुत रहस्य खुलते हैं ..रत्नों की समझ आती है .. अद्भुत रुप से आकार लेते हैं स्वप्न  परिवेश से लेकर  अतीत की यादों से स्वयं सिद्ध  होकर आकार लेते स्वप्न... अचंभित करने वाले स्वप्न.... स्वप्न सच्चाई की गहराई से निकले तिलिस्मि  सपने  सपने अपने फिर भी अपने नहीं ..पर सपनों में जन्म लेते सपने .....