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ज्योति और प्रकाश

ज्योति जली, प्रकाश की उपस्थिति निश्चित थी  चहूं और उजाला छा गया  मैं ज्योति जलती रही - -  जल-जल के स्वाहा होती रही - -  ज्योति के भव्य प्रकाश से  सबके नेत्र चुंधयाने लगे  ज्योति थी, तो प्रकाश की जगमगाहट भी थी जगमगाहट में आकर्षण भी था  आकर्षण की कशिश में गुमनाम अंधेरों ने धीमे-धीमे दस्तक देनी प्रारम्भ कर दी  उजाले के आकर्षण में सब इस कदर व्यस्त थे कि, मन के अंधेरों ने कब दस्तक देनी प्रारम्भ कर दी की पता  ही नहीं चला - - जब तक ज्योति जलती  रही, जल-जल कर स्वाहा होती रही सब व्यस्त रहे जब बाती धुआं बनकर उडने लगी  सबकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया  ज्योति का दर्द सरेआम हो गया  सबके दिलों से आह! निकली नेत्रों से अश्रु बहने लगे  काले धुएं ने हवाओं में अपना घर कर लिया था  जब तक प्रकाश था, सब खुश थे  प्रकाश का दर्द किसी ने ना जाना जब प्रकाश का दर्द धुआं बनकर उड़ने लगा  तब सब उसे कोसने लगे - -  बताओ ये भी कोई बात हुई  जब तक हम जलते रहे सब खुश रहे  आज हमारी राख से धुआं क्या उठने लगा  सब हमें कोसने...

रोना बंद करें स्वयं को सक्षम बनाइए

  रोना बंद करें स्वयं को सक्षम बनाइए **       मेरे एक मित्र ने मुझे कहा कि मैं किसी की वजह से बहुत दुःखी हूं ।    मैंने उसके साथ कभी भी बुरा नहीं किया ,उसने मेरे साथ इतना बुरा क्यों किया ,मैंने उसका क्या बिगाड़ा था । उसने जो कुछ भी बुरा किया है ,ना उसका फ़ल उसे भगवान देगा ...........    एक पल को तो मैं अपने मित्र की बातों से भावुक हो गई ,बड़ा दुःख हो रहा था मुझे उसकी स्थिति देखकर ...... फिर मैंने सोचा एक तो यह पहले ही दुःखी है , मैं इसका दुःख कम करने की बजाय बढ़ाने का काम करूं ,नहीं -नहीं यह ठीक नहीं होगा ...........    मैं अपने मित्र की हर बात बड़े ध्यान से सुन रही थी,वो इसलिए नहीं की मैं उससे सहमत हूं ,वरन इसलिए कि वो अपने दिल की सारी भड़ास निकाल दे और अपना दिल हल्का कर ले......    मेरा मित्र इतना दुःखी हो रहा था मानों...आगे कोई उपाय ही ना हो ....   इतना सारा शब्दों का जहर उसके मुंह से बातों के रूप में निकल रहा था , कि सारी धरती जहरीली हो जाए ,उसने मेरे साथ बुरा किया ,उसका भी कभी भला नहीं होगा उसने धोखे से हमसे सब कुछ छी...

अपने मालिक स्वयं बने

अपने मालिक स्वयं बने, स्वयं को प्रसन्न रखना, हमारी स्वयं की जिम्मेदारी है..किसी भी परिस्थिति को अपने ऊपर हावी ना होने दें।  परिस्थितियां तो आयेंगी - जायेंगी, हमें अपनी मन की स्थिति को मजबूत बनाना है कि वो किसी भी परिस्थिति में डगमगायें नहीं।  अपने मालिक स्वयं बने,क्यों, कहाँ, किसलिए, इसने - उसने, ऐसे-वैसे से ऊपर उठिये...  किसी ने क्या कहा, उसने ऐसा क्यो कहा, वो ऐसा क्यों करते हैं...  कोई क्या करता है, क्यों करता है,हमें इससे ऊपर उठना है..  कोई कुछ भी करता है, हमें इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए.. वो करने वाले के कर्म... वो अपने कर्म से अपना भाग्य लिख रहा है।  हम क्यों किसी के कर्म के बारे मे सोच-सोचकर अपना आज खराब करें...  सोचता तो हर पल कोई ना कोई कुछ ना कुछ रहता ही है ....फिर क्यों ना अपनी सोच  को सही सोच की तरफ मोड़ें सामने ऊंचे पहाड़ या गहरी खाई आ जाये तो क्या आप रुक जायेगें .... आप ही को बदलना पढेगा अपनी सोच को अपनी राहों को ... नहीं बदलोगे तो जिन्दगी भर रोते रहो ...या फिर बदल लो अपने रास्तों को ..और बढ जाओ आगे की ओर...   **** जब-जब हमार...

ब्रह्म अस्त्र

सरलता मेरा आत्मबल है  सहज बन जीने दो मुझे - -  सरलता का अमृत रस मुझे पीने दो - -  निश्चिंत हूं,की  ब्रह्मास्त्र है मेरे पास अद्वितीय अदृश्य संरक्षित है मुझमें - सरल, सहज निर्मल स्वभाव है, मेरा-- भीतर दावानल भी है मेरे  अपनी शक्तियों का दिखावा कर प्रदर्शन नहीं  करना मुझे - - विश्वास है मुझे  मेरे ब्रह्म अस्त्रों पर-- सदा ले दावानल का आधार - -  क्यों करूं अत्याचार  सरलता मेरा आत्मबल है क्यों कर मुझे उकसाते हो  मेरे भीतर की आग को भड़काते हो  ब्रह्मअस्त्र भीतर है मेरे..  मुझे मेरी शक्तियों पर विश्वास है  सहज बन जीने दो मुझे  सरलता का अमृत रस मुझे पीने दो - -  पुष्प बन खिलने दो, आंगन को महकाने दो  कोमलता का आवरण ओढ धरा पर  प्रेम रस बहाने दो - - सरलतम् व्यवहार से  धरती का श्रृंगार करने दो-   कोमल भावनाओं की मिठास से  विनम्रता  का पाठ पढाने दो मुझे - -  ठेस दोगे तो मेरी भयंकर कराह से डगमगा जाओगे  शूल रक्षक हैं मेरे - - संरक्षण भी है मेरे -  दावानल को ना उकसाओ  सरलता...

कश्तियां

भाव सागर चल रही है, कश्तियां संसार की  लहरें सागर उठ रही, भीतरी एहसास की  लहरों की ऊचाईयां, या,अरमानों की उठापटक  दिल का दरिया बह रहा, समुंदर सा हो रहा।  कोई समझने वाला ही नहीं, भीतरी एहसास है  तूफान तो आयेगा, भीतर ज्वाला धधक रही  समाज की बेड़ियों में  सिसक वो कराह रही  चीखों पुकार है,  कैसा यह उद्गार है..  सिसकियों में कह रहा, तूफान की आहट हुई  भीतर जो उद्गार है.. वधिक में व्यक्त है  घाव था ना जो भरा, हाल उसका है बुरा अंतिम दौर है, कराह का शोर है,आह! सब और है। 

उड़ान

आज फिर निकला हूँ घर से ख्वाबों का नया जहाँ बनाने को  खुले आसमां में उडान भरने को - -  हकीकत धरती पर फिसल गयी  जब पाषाण के टुकड़े पर पादुका अड गयी नजर धरती मां पर रुक गयी  किया प्रणाम--बड़ा सम्मान  धरा पर चलने को दिया स्थान आसमान की बातें धरती से जुड़ गयी  धरती से आसमां की नजरे मिल गयीं  ख्वाबों की हकीकत आंखों में उतर गयी  मंजिल अभी दूर है, चलना अभी बहुत दूर तक है  धरती से मेरी मोहब्बत बड़ गयी..  ख्वाबों की जमीं आसमां से जुड़ गयी  ख्वाब सजते थे यहाँ, पलते थे वहां  धरती की हकीकत आसमां में दिख गयी  खोखले स्वार्थ की आग , आसमां में धुआं बनकर उड़ गयी  ख्वाबों की जमीं धरा पर जीवंत हो गयी  . आसमान तक की उड़ान में एक कड़ी और जुड़ गयी। 

अद्भुत रंग

कोमल मन अद्भुत रंग  भाव जागे हर्षित मन  पुष्प मरकंद कोमल अक्स  पवित्र बंधन जीवन धन  प्रेम विश्वास प्रिय अनुबंध  अनुराग प्रीती समर्पण  राग रागीनी सुरम्य संगीत  जीवन कलश अद्भुत रीत ह्रदय बसे अगम्य रस प्रसन्नचित्त ह्रदय प्रफुल्लित मन अमिय गागर-नयन नीर  भाव समुद्र अनकही तकरीर  शब्द मौन मन ही जाने मन कही  समर्पित जीवन जागीर  ह्रदय बसायी तस्वीर  दिल खींची लकीर  फिरे बन फकीर  मानों दुनियाँ का बड़ा अमीर।।