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हिंदी मेरा अभिमान

मेरा देश हिंदूस्तान‌ मेरी पहचान हिंदी मेरी मात्र भाषा मेरा अभिमान  क्यूं भटकूं दर ब दर मेरे देश में रत्नों की खान‌  अपने तो अपने होते‌ हैं  बाकी सब तो सपने होते हैं ‌‌ करता हूं मैं सबका सम्मान   मेरी मात्र भाषा हिंदी है मेरा‌ अभिमान‌  निजता में सहजता  सहजता में सरलता  सरलता में गहनता‌  गहनता में बुद्धि विवेक का ज्ञान ‌‌ ज्ञान जीवन का सम्मान ‌‌ भीतर समाहित संस्कृति और सभ्यता का वैभव ‌‌ निज भाषा हिंदी का ह्रदय से मां तुल्य सम्मान 

पिछले पन्ने

 जिन्दगी की दौड़ में  उम्र के मोड़ पर निकल गया था बहुत आगे, आज यूं ही  फुर्सत के पलों में पलट गये   कुछ पिछले पन्ने याद आ गयी    पुरानी बातें सुनहरी यादें  कुछ गुदगुदाती कुछ मुस्कुराती  अल्हड़ पन की नादान शरारतें ‌‌ लूडो, कैरम ,छुपन- छुपायी,चोर- पुलिस  खेलने की नादान हसरतें  वो दिन भी कितने अच्छे थे  कितने सच्चे थे ,वही तो दिन थे  जब हम जीते थे जब हम बच्चे थे  कितने अच्छे थे, वही तो जीवन था जो जी लिया  वरना अब तो सिर्फ भाग रहे हैं जाने कौन  सी  प्रतिस्पर्धा में स्वयं भी नहीं जानते  बेहतरीन जीवन जीने की होड़ में जीना ही भूल गये ‌‌ गया वक्त लौटकर नहीं आता  सपने बस वो ही तो थे अपने  उन पन्नों में यादों की तिजोरी में  आज भी सम्भाली हुयी थी वो यादें  परियों के किस्से बचपन के रिश्ते  बड़ी खूबसूरत लगेगी बीती बातें  वो अनकही नादान बेफिक्र शरारतें  शरारतों में भी शराफत थी  किसी से ना कोई बगावत थी   मन की थकान को देने को आराम  ढूंढ निकाल लिया करो कुछ पल...

हिंदी शाश्वत है सत्य की भाषा है..

क्यों मैं भटकूं दर ब दर अपनों के मध्य पाना है सर्वप्रथम आदर  क्योंकि मेरी जड़ों ने मुझे सम्भाला है  हिंदी का अस्तित्व शाश्वत एवं निराला है  हिंदी भाषा में ही मैंने सर्वप्रथम अपने भावों को ढाला है  भाषा पहचान है अस्तित्व है  भाषा अभिमान है शान है  हिन्दूस्तान ने मुझे पाला है हिंदी मातृभाषा ने ही मुझे सम्भाला है मेरे अस्तित्व को निखारा है  इतिहासकारों ने विचारों को हिंदी भाषा के माध्यम से अनेकों रुपों में संजोकर भविष्य की धरोहर बना डाला है  अनेकों ग्रन्थों को हिंदी भाषा में अपनी पहचान है  सभ्यता एवं संस्कृति का आधार  हिंदी मेरी प्रिय भाषा  मेरी पहली पसंद है  मेरी अपनी मातृभाषा हिंदी  हिंदी में जो बिंदी है  भाषा का श्रृंगार है ,रस अलंकारों छंदों का दिव्य आधार है  मेरे रोम-रोम में बसती हैं हिंदूस्तान की हवायें  मातृभूमि की फिजाओं ने‌ मुझे पाला हिंदीस्तान के ही गुण गाऊं‌  मुझमें रचता- बहता हिन्दुत्व  हिन्दू साहित्य और संस्कृति का सत्व  सर्वप्रथम हिंदी के गुण गाऊं...... हिंदी को विश्वपटल पर पहचान दि...

प्राण वायु

प्रकृति में समाहित जो ना प्राण वायु ना होती  तो सोच मनुष्य जमाने में तेरी औकात क्या होती नतमस्तक हो कर प्रणाम,धन्य तेरा जीवन कर सम्मान मेरी पहचान के क्या कहने  मात्र कुछ रुपए पैसे और गहने  जीविका के साधन का सामान  मैं जाने क्यूं करता हूं बिन बात अभिमान  जबकि सबसे अनमोल है तन के भीतर प्राण  प्रकृति अनमोल सम्पदा वृक्ष,नीर,प्राण वायु अमूल्य धन  जिनसे धरती पर जीवित है जीवन  प्रकृति में निहित प्राणवायु का आधार  इन हवाओं का भूलूं कैसे उपकार  इन हवाओं से रचा-बसा है मेरा जीवन संसार  इनके बिना मैं कुछ भी नहीं  मेरे अस्तित्व की खबर भी ना होती  अगर वातावरण में प्राणवायु ना होती 

कर्म

हम कल भी थे  आज भी हैं  और हमेशा ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌रहेंगें  हम किसी भी मनुष्य के कर्म हैं  कर्म विचारों की उथल-पुथल  का महासंग्राम है  परिक्षा का परिणाम है, संयम   कर्म के तराजू पर क्रियात्मक एवं  मानसिक दोनों ही कर्मों का आकलन हुआ  शुभ सरल साकारात्मक विचारों का बादशाह  सरलता से शुभ भावों को संग लेकर  सादगी की कश्ति में सवार हो दरिया पार हो गया, समझदारी का चोला पहने होशियार उलझाता  और उलझता रहा है और कर्मों की गांठों में जकड़े रहा  कर्म तराजू पर पारदर्शिता ही काम आयी चालाकियां सारी  धरी की धरी रह गयी । निस्वार्थ भाव से समाज के लिए प्रेरणादायक  कर्म सदैव अमर रहते हैं, कर्म पहचान बनाते हैं ‌‌ अच्छे कर्म मनुष्य के मनुष्य होने का सत्य बताते हैं 

आशा दीप

भीतर भर एक आशा  स्वयं का स्वयं पर विश्वास  भर आस‌ जला एक आशा दीप  भीतर एक विश्वास  मन की आवाज़  जीत का आगाज ‌‌ आशाओं का चिराग  दीप प्रज्जवलित कर  प्रयासों के आधार ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌से  रच जायेंगे इतिहास  स्वयं से कर आगाज  बेहतरीन ‌‌‌‌‌होगे काज  जितायेगा तुझे तेरा ही विश्वास .... कर्मनिष्ठता संग आत्म बल की भर आस   भरोसा स्वयं का स्वयं पर विश्वास .... 

कायनात

सारी कायनात का मालिक है तेरा क्यों दर ब दर भटकता है  जो उसका है वो तेरा है  क्यों उससे जुदा होकर  फकीरों ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌सी ज़िन्दगी बसर करता है  दुनियां में सबसे अमीर हो जायेगा  है‌ , क्यों बूंद बनकर बरसता है  माना की गुलाब पर मोती बनकर चमकता है  धूप में भाप से अपना अस्तित्व पल में खत्म करता है‌  क्यों दर ब दर भटकता है समुन्दर तेरा अस्तित्व  सारा आकाश ही तेरा है तेरा वजूद चांद - तारों से रोशन हुआ करता है ।