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Showing posts from 2026

हृषीकेश से ऋषिकेश तक

 शाश्वत- जो सदैव से है ,जिसका ना आदि ना अंत सनातन से सृष्टि की उत्पत्ति हुई  ।  सनातन  यानि  सत्य का विस्तार  सन-जो सत्य है तन यानि विस्तार  जहां से सृष्टि की उत्पत्ति हुई एवं आज जो सृष्टि है वह सनातन के वंशज हैं । देश ,परिस्थिति एवं काल के अनुसार कई शाखायें बन गयीं ,मतभेद अलग-अलग हो गये ,किन्तु मूल में सबके सनातन ही है । सनातन सत्य है शाश्वत है आदि एवं अनन्त है। पहाङों की तलहटी में बसे अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर, पर्वतों की ऊंची-ऊची चोटियां जहां संगीत गाती हैं पर्वतों की कोख से जहां पवित्र नदियों का उद्गम स्थल है । पतित पावनी अमृतमयी मां गंगा के किनारे  सघन वृक्षों की छांव में बैठकर जहां ऋषियों ने घोर तपस्या की ,उस ऋषिकेश धाम की पवित्रता अकथनीय अवर्णनीय आलौकिक है । हृषीकेश जिसको आम बोल-चाल की भाषा में ऋषिकेश ही कहा जाता है । हृषीकेश यानि इन्द्रियों के स्वामी  रैभ्य श्रृषि की कठोर तपस्या मन और इन्द्रियों का संयम की कठोर तपस्या से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने रैभ्य ऋषि को हृषीकेश नारायण के अवतार  में दर्शन दिये ।      ...
सृष्टि के आदिकाल से अनन्त काल तक  भावों में बहती है काव्य रस धार  कविता शाश्वत है,अमर है,अजन्मा है  कविता अनन्त है ,कविता कल भी थी आज भी है ,और हमेशा रहेगी कविता  भावों का गहरा समुंद्र है ।

ऋतु बंसत प्रसून उद्यान

ऋतु ,प्रसून बंसत उद्यान  केसरिया अरुणिम,वनस्पति केसरिया अर्क  अलकृत धरा स्वर्णिम ब्रह्मांड  ऋतु बंसत फुलवारी ,बहूरंगी छटा महतारी  फूलन सज्जा आंगन बारी, सुगन्धित समीर मन श्रृंगारी सुमन,कुसुम प्रसून,मंजरी ,गेंदा गुलाब, गुडहल,रजनीगंधा  सरसों ,ट्यूलिप सूरजमुखी ,वसुधा प्रवृत स्वर्णिम अंलकृत मनोहारी मनभावन मन ,नाटन करे, हिय पंख फैलाये स्वर्णकार  बंसत की बंसती बहार ,वसुधा करे षुष्प श्रृंगार  निसर्ग अवनि शिल्पकार ,वर्ण कांति प्रसून उद्यान   उल्लासित अंतःकरण ,ऋतुराज ,बंसतबहार  कुसुमकार वरणी साम्राज्य ,पुष्प नृप कौमुदी ,पुष्पराज  देवपुष्प ,देवराज पाटल ,सुवास,मकरंद मन जागे उमंग  ट्यूलिप, गुलाब,गेंदा बुराश गुङहल, मन नर्तन करे बिन थाप  सोलह श्रृंगार निसर्ग व्यवहार अद्भुत चित्रकार।

शहनाईयां

गूंजती हैं शहनाईयां  पर्वतों की वादियां  हवाओं की सरगम पर  पत्तों की तालियां  पहाङों की ऊचाईयां  भरपूर आजादियां  कायनात की सरगम  भूमि संग तरूवर के गहरे रिश्ते  धरती मां की गोद में जङों की मजबूती का विशालकाय संसार मिट्टी से जुडे  ऊचांइयों पर लिखते कहानियां  हमारी भव्यता की सच्चाईयां  भूमि से सम्बन्धों की गहराईयां  हमारी जङों से ही हमारी उचांइयां  हवाओं की सरगम पर पत्तों की शहनाई  जब बजती हैं,प्रकृति भी झूमती है  और धरती पर सजते हैं हरियाली के ग्रन्थ  वृक्षों के बीजों की भव्यता अपने अस्तित्व का  के अंकुर से निरंतर युगों-युगों से पोषित होती वसुंधरा    

एहसास

मैं मनुष्य जीवन हूं  मैं एहसासों की लहर हूं कैसे ठहर जाऊं  कर्मों की उडान भरने को आजाद  माया के पिजरें में कैद होकर स्वयं ही फंस जाता हूं  मैं खूशबू हूं किसी के हाथ नहीं आती   मैं ठंडी हवा की लहर हूं छूकर उङ जाती हूं  मैं एक मीठा सा एहसास हूं  जो दिल को छू जाती हूं  मैं एक आवाज हूं, दिल के तारों  की सरगम वाणी की झंकार  का एक एहसास जो शब्दों  से बयां करके कर्ण द्वारों से गहराई में  उतर भावों की नौका को पार लगाती हूं । नजरों से छिपकर रहती हूं  पर हर दिल को छू जाती हूं  मैं छिपकर एहसास दिलाती हूं  मैं दिखती नहीं हवाओं में बिखर जाती हूं   मैं पुष्पों में सुगन्ध हूं किसी हाथ नहीं आती हूं   मैं भावों में कैद एक खूबसूरत एहसास हूं  फितरत है उङने की ,पंख नहीं फिर भी उडती हूं  मेरी नजरें जमीं पर आसमां पर विचारों के पंखों से  उडान भर सदूर गगन की अंतहीन ऊचाइयों में  रहस्यमयी दुनियां में लुप्त हो जाती हूं । मैं भावों हूं एहसासों की खूबसूरत बात हूं ।

प्रार्थना

नमस्कार, मंच पर उपस्थित मेरे सह मित्रोॅ को एवं  समस्त माननीय अतिथियों को ..  मेरी राम राम जी सबको । कहते हैं किसी भी अच्छे काम की शुरुआत प्रार्थना से होनी चाहिए ।  अतः मैं आपके समक्ष स्वरचित प्रार्थना प्रस्तुत करने.जा रही हूं ।   मन में लिए शुभ भावना ,परमार्थ हमारी अराधना  सेवा हमारा संकल्प है,परहित हमारा उद्देश्य  मानवता का संग है,जन कल्याण हमारा लक्ष्य है।  व्याधि पीड़ा बन उपचार ,करना है सदा ही परोपकार -2 उपकारी जीवन सद्व्यवहार, परस्पर प्रेम की फसल उगानी . गंगा जल सम अमृत बनकर जन परोपकार ही  करना है  । इनरव्हील ऋषिकेश ने लिया है प्रण निष्काम सेवा का संग्राम स्वच्छंद .. इनरव्हील ऋषिकेश के हौसले है बुलंद .. सेवा के पथ पर डटे रहेगें । -2  परहित हमको प्यारा है  -2  

रोशनी ही सत्य है

रोशनी ही सत्य है  रोशनी में ही गूढ रहस्य है  रोशनी की अठखेलियाँ हैं  अनकही सी पहेलियां हैं रोशनी है तो जिन्दगी है , जिन्दगी है तो रोशनी है रोशनी की सब कहानी  चल रही जिन्दगानी है  तुझ में रोशनी,मुझमें रोशनी  समस्त संसार की रोशनी  ये ब्रह्मांड कायनात की रोशनी  रोशनी से रोशनी में नहाता यह संसार  रोशनी ने लिखी जीवन की कहानी  रोशनी से चल रही सृष्टि सारी कहानी 

जीने के ढंग

 हे परमात्मा हमें जीने का ढंग दो   खुशियों के रंगों को भरने की कूची दो  वाणी में संयम दो,विचारों में दिव्यता का प्रकाश दो   भावों में खूबसूरती का वर दो   सुमधुर भावों का संग दो   नयनों से भरकर जो मस्तिष्क   में उतर जाये मनोहारी पुष्प वाटिका बना दो  ब्रह्मांड के आचरण की सौम्यता दो  माधुर्य रस का सरस क्षीर बना दो  मुस्कराहट का सबब बन दिलों को  हर्षोल्लास से भाता जाऊं  ऐसा अमृत कुंभ बना दो  हे परमात्मा मुझे जीने का ढंग दो 

खुशीयां

खुशियां पायी नहीं जाती खुशियों को ढूढना पङता हैं  खुशी भीतर की एक सुन्दर अवस्था है  माना की जीवन में बहुत  व्यवस्ता है  खुशियों को खोजना पङता है  मिल ही जाती है खुशी मदमस्त हवाओं में  बगीचों की क्यारियों में मुस्कराती कलियों में  फूलों की महकती हवाओं में   सच्ची खुशी पाने की चाह में   निकल पङे तलाश में  मन बहलाने को बहुत कुछ मिला  दिल बहला पर टिकाऊ खुशी ना मिला   बिखर गये संसार में  पाने को बहुत कुछ  बंट गये बाजार में  कीमत कौडियों की ना रही  ठोकरों ने  दिया तोङ खण्डित भी हुए इस कदर  कोई हकीम ना मिला इलाज को  तेवर हमेशा ज्यों के त्यों  टस से मस ना हुई ऐठ   कुछ लचीलापन होता तो कहीं  जगह बना पाते अकङे रहे  बांस की तरह तो खोखले से  सूखते रहे सूख कर मुरझा गये 

ऐ जिन्दगी ठहर जरा

 ए जिन्दगी जरा और ठहर  कुछ और पहर  थोङा और जी लूं जरा. मन का कहा कुछ  कर लूं जरा  कुछ और सुन लूं जरा  मनमानी सी मस्तियां कर लूं मैं भी आज मेरे हक में है हवा चली है दिल में मची खलबली है  फुर्सतों की घङियां मिली हैं  जुल्फों को समेट लूं मैं भी जरा मीठी हवा की मीठी कोशिश में  चहलकदमी कर लूं मैं भी जरा सी  पंख फैलाकर आसमान की ऊचांइयों में  बन पंछी उङ लूं मैं भी मुस्करा कर नील गगन से वसुंधरा की छवि निहारूं  प्रकृति की खूबसूरती पर वारि जाऊं  फूलों सी महक लूं मैं भी जरा सी  गुजरूं  जिधर से एक हलचल मचा दूं  एक हुनर अपने में निखार लूं जरा सा  अपनी खूशबू हवाओं में बिखेर एक खूबसूरत  कहानी लिख दूं ,जो सबके दिल के करीब हो पङे जो कहे सब ऐसे ही खुशनसीब हो ।  

लंदन

पङ लिखकर गया है लंदन  बेटा मेरा बङा ही हैंडसम  बचपन से उसके सपने ऊंचे  ऊँचा पद ऊंची शान  बङी जाब बङी पहचान   डालर में वो income पाता  पिज्जा बर्गर का वो फेन  बारह घंटे आनलाईन रहता Busy हूं वो हरपल कहता  समय व्यवस्था इतनी खाना भी  काम के टेबल पर मंगवाता  तरक्की हो बच्चों की इसमें हमारी भी खुशी  देश हो या विदेश बच्चे रहें खुशहाल  भेजें हम दूर रहकर ही उनको दुआएं  कट जायेगीं हमारे जीवन की बाधाऐं  आधा जीवन बीत गया हमारा  बाकी बचा भी कट जायेगा । पङोसी हमारे बङे ही अच्छे  आकर रोज हालचाल वो पूछते  दवा,राशन ,फल,सब्जी का रखते ध्यान  पङोसी हमारे बङे ही दयावान  करते वो दिल से सम्मान  प्रभु भक्ति में मन लगाते हैं  सादा भोजन हम पाते हैं  बेटे की जब याद आती   उसकी बचपन की नादानियों  में खो जाते कभी सहलाकर, कभी प्यार से  कभी डांटकर कभी लाड से बेटे को पाला  सारी जवानी की तपस्या बेटा बना intelligent अपना । काट लेंगें 

पुष्प प्रेम की सौगात

  देने के सिवा मुझे  कुछ आता नहीं !!!!!                        पुष्प प्रेम की सौगात प्रकृति का अनुपम उपहार                                          एक दिन मैंने पुष्प से पुछा                                       आकाश की छत मिटटी की गोद ,                                    क्या कारण है जो काटोंकेबीच भी,                                    बगीचो की शोभा बढ़ाते हो ,                               दुनिया को रंग-बिरंगा खूब सूरत बनाते हो           ...

तिजोरियां

तिजोरियां तो हैं ! सही बात है  सब कहते हैं कई युगों से यह तिजोरियां बंद पङी हैं  खुली नहीं हैं  तिजोरियां हैं तो कुछ ना कुछ कीमती भी जरुर होगा  जानना तो हर कोई चाहता होगा  तिजोरियों में क्या छिपा होगा तो फिर ढूढिये कूंजी मानचित्र की जो बता सके सही दिशा । कहां जा रहे हो सच्ची खुशी की तलाश में  एक राज की बात बताऊं ! बाहर मत जाओ ,बाहर जाओगे तो भटक जाओगे     क्योंकि ? कीमती मूल्यवान वस्तुऐं अक्सर  तिजोरियों में छिपाकर रखी जाती हैं । भीतर की यात्रा पर निकल जाओ  अमूल्य रत्नों की भरमार मिलेगी । कई रहस्यमय शक्तियों से पहचान होगी  चमत्कारों की खान मिलेगी । तिजोरियों की रहस्यमयी दिशाऐं  भीतर गहरी गुफाऐं अद्भुत अदृश्य अकथनीय,  अवर्णनीय तिजोरियां । अंतहीन यात्रा रास्ता सही पकड़ लिया तो  निकल जाओगे मंजिल की ओर  एक से एक अजूबों से मुलाकात होगी। कई असीम शक्तियों से साक्षात्कार होगा  कई विचित्र परिस्थितयां समक्ष आयेंगी  घबराना मत विचलित मत होना 

जश्न की तैयारी

जश्न की करनी है तैयारी  एकत्रित करनी है आवयशक वस्तुतऐं सारी  जश्न मना सफर कर  अंजान हैं राहें, लौटना होगा मगर  यह भी तय है  पगडंडियों की ना परवाह कर   रास्तों की उबड़-खबङ  पैरों में पत्थरों की रगङ  गम ना कर ज़ख्म यह भर जायेगें  हार -जीत की ना तू परवाह ना कर  चल निकल चल चलाचल  ऊंच-नीच की पहाङियां  समीप गहरी खाईयां  रास्ते कट जायेगें  नामुमकिन तो कुछ भी नहीं  तू खुद शहनशाह  तू स्वयं ही अपना बादशाह   सवालों को तू हल कर   बुद्धि,विवेक की कूंजियां  भीतर तेरे पूजियां  रास्तों की ना तू फिक्र कर  ऊंचें पहाड़ हो या गहरी खाईयां  काम तेरा है मंजिल तक पहुँचना  श्रेणी की  ना कर लालसा  कर्म की रख प्रधानता  जश्न मना कर ना देर कर  प्रश्नों के तू हल निकाल  जीवन बनेगा तेरा खुशहाल।  

परवरिश बाल मन की

       प्रस्तावना  आगे बढना प्रकृति का नियम है। प्रकृति एवं मनुष्य अपनी -अपनी नियति के अनुसार बढ़ते रहते है,उनका एक जीवन चक्र है जो निर्धारित समय के अनुसार चलता रहता है । *यहां हमारा विषय है *परवरिश बाल मन की*  हल्के में मत लिजिए इस परवरिश को ,बहुत ही जिम्मेदारी का काम है यह परवरिश* प्रकृति के संरक्षण के लिए परमात्मा ने स्वयं व्यवस्था की है ,मौसमों के रुप में ,वायु सूर्य मिट्टी खाद ,जल प्रकृति का पोषण करते हैं ।   आज का मंहगाई का जमाना , परिवार का खर्चा चलाना , बिजली ,पानी दुनियां भर की आधुनिक सुविधाओं की आवयशकता ,बच्चों की शिक्षा के नये-नये कार्यक्रम उसके खर्चे ,कई परिवारों में आवयशकता हो जाती है ,पति -पत्नी दोनों का घर से बाहर निकल कर काम करना ।  क्यों ना हो , सबको समानता का अधिकार जो है ।अगर सामने वाले में काबिलियत है ,तो काम करने में कोई बुराई  नहीं ।                   (  1)  सरीन परिवार शहर का एक सम्पूर्ण सम्पन्न परिवार धन -दौलत एश ओ आराम घर के सदस्यों के मुंह से एक भी मांग निकल...

मेरे अपने

जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं  वो मेरे सामने नहीं होकर भी  मेरे पास होता है, लोग कहते हैं  यह तेरे मन का धोखा है  मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है  वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है  मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है   कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है । मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है । वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है  मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है मैं रहती धरती पर हूं  बातें आसमान की करती हूं  चलती धरा पर हूं  और नजरें ऊपर आसमान की  ओर रहती हैं । ऊपर की ओर इसलिए नहीं की स्वयं को बडा  समझती हूं ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में  क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च  ऊचांइयों में ।