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Showing posts from 2026

रोशनी ही सत्य है

रोशनी ही सत्य है  रोशनी में ही गूढ रहस्य है  रोशनी की अठखेलियाँ हैं  अनकही सी पहेलियां हैं रोशनी है तो जिन्दगी है , जिन्दगी है तो रोशनी है रोशनी की सब कहानी  चल रही जिन्दगानी है  तुझ में रोशनी,मुझमें रोशनी  समस्त संसार की रोशनी  ये ब्रह्मांड कायनात की रोशनी  रोशनी से रोशनी में नहाता यह संसार  रोशनी ने लिखी जीवन की कहानी  रोशनी से चल रही सृष्टि सारी 

जीने के ढंग

 हे परमात्मा हमें जीने का ढंग दो   खुशियों के रंगों को भरने की कूची दो  वाणी में संयम दो,विचारों में दिव्यता का प्रकाश दो   भावों में खूबसूरती का वर दो   सुमधुर भावों का संग दो   नयनों से भरकर जो मस्तिष्क   में उतर जाये मनोहारी पुष्प वाटिका बना दो  ब्रह्मांड के आचरण की सौम्यता दो  माधुर्य रस का सरस क्षीर बना दो  मुस्कराहट का सबब बन दिलों को  हर्षोल्लास से भाता जाऊं  ऐसा अमृत कुंभ बना दो  हे परमात्मा मुझे जीने का ढंग दो 

लङकी

 सपनों में सोचा था, सपना तो सपना ही होता है एक दिन अपना भी सपना सच हो गया  परमात्मा का इशारा हुआ,  आंखों को दीदार हो गया  हम सबका सपना साकार हो गया  एक दिन वो हकीकत में मिल गयी  सादगी उसकी  दिल को भा गयी  एक बिटिया हमको पसंद आ गयी  दिल की सच्ची वो आंखों में मस्ती भरी सुनहरी तितली सी उडती वो नजर आ गयी  हम सब के दिलों में वो घर कर गयी  एक बिटिया - -  हमने जीवन में उसको घर कर लिया  मानों जन्मों का बंधन हमने तय कर लिया।  कोमल रिश्तों से बंधन बांधने को वो मायके से ससुराल की हो गयी  लाडली वो गोस्वामी परिवार की  कली बागों में महकती रहे खिली-खिली  हमने फूलों का उसे गूलदस्ता कर लिया  असूजा परिवार की रौनक वो बनकर रहेगी  हम सब प्रेम से उसकी बागवानी करेगें  अपने गुणों से वो सबका नाम रोशन करेगी  एक घर में वो पली दूजे घर में राज करेगी।   हे परमात्मा तुम हम पर कृपा रखना सुन्दर माला  में हमको पिरोये रखना - -कमी एक दूजे की हम  माफ करेगें, होठों पर सदा मुस्कान रखेगें  श्रीराम ...

खुशीयां

खुशियां पायी नहीं जाती खुशियों को ढूढना पङता हैं  खुशी भीतर की एक सुन्दर अवस्था है  माना की जीवन में बहुत  व्यवस्ता है  खुशियों को खोजना पङता है  मिल ही जाती है खुशी मदमस्त हवाओं में  बगीचों की क्यारियों में मुस्कराती कलियों में  फूलों की महकती हवाओं में   सच्ची खुशी पाने की चाह में   निकल पङे तलाश में  मन बहलाने को बहुत कुछ मिला  दिल बहला पर टिकाऊ खुशी ना मिला   बिखर गये संसार में  पाने को बहुत कुछ  बंट गये बाजार में  कीमत कौडियों की ना रही  ठोकरों ने  दिया तोङ खण्डित भी हुए इस कदर  कोई हकीम ना मिला इलाज को  तेवर हमेशा ज्यों के त्यों  टस से मस ना हुई ऐठ   कुछ लचीलापन होता तो कहीं  जगह बना पाते अकङे रहे  बांस की तरह तो खोखले से  सूखते रहे सूख कर मुरझा गये 

ऐ जिन्दगी ठहर जरा

 ए जिन्दगी जरा और ठहर  कुछ और पहर  थोङा और जी लूं जरा. मन का कहा कुछ  कर लूं जरा  कुछ और सुन लूं जरा  मनमानी सी मस्तियां कर लूं मैं भी आज मेरे हक में है हवा चली है दिल में मची खलबली है  फुर्सतों की घङियां मिली हैं  जुल्फों को समेट लूं मैं भी जरा मीठी हवा की मीठी कोशिश में  चहलकदमी कर लूं मैं भी जरा सी  पंख फैलाकर आसमान की ऊचांइयों में  बन पंछी उङ लूं मैं भी मुस्करा कर नील गगन से वसुंधरा की छवि निहारूं  प्रकृति की खूबसूरती पर वारि जाऊं  फूलों सी महक लूं मैं भी जरा सी  गुजरूं  जिधर से एक हलचल मचा दूं  एक हुनर अपने में निखार लूं जरा सा  अपनी खूशबू हवाओं में बिखेर एक खूबसूरत  कहानी लिख दूं ,जो सबके दिल के करीब हो पङे जो कहे सब ऐसे ही खुशनसीब हो ।  

लंदन

पङ लिखकर गया है लंदन  बेटा मेरा बङा ही हैंडसम  बचपन से उसके सपने ऊंचे  ऊँचा पद ऊंची शान  बङी जाब बङी पहचान   डालर में वो income पाता  पिज्जा बर्गर का वो फेन  बारह घंटे आनलाईन रहता Busy हूं वो हरपल कहता  समय व्यवस्था इतनी खाना भी  काम के टेबल पर मंगवाता  तरक्की हो बच्चों की इसमें हमारी भी खुशी  देश हो या विदेश बच्चे रहें खुशहाल  भेजें हम दूर रहकर ही उनको दुआएं  कट जायेगीं हमारे जीवन की बाधाऐं  आधा जीवन बीत गया हमारा  बाकी बचा भी कट जायेगा । पङोसी हमारे बङे ही अच्छे  आकर रोज हालचाल वो पूछते  दवा,राशन ,फल,सब्जी का रखते ध्यान  पङोसी हमारे बङे ही दयावान  करते वो दिल से सम्मान  प्रभु भक्ति में मन लगाते हैं  सादा भोजन हम पाते हैं  बेटे की जब याद आती   उसकी बचपन की नादानियों  में खो जाते कभी सहलाकर, कभी प्यार से  कभी डांटकर कभी लाड से बेटे को पाला  सारी जवानी की तपस्या बेटा बना intelligent अपना । काट लेंगें 

पुष्प प्रेम की सौगात

  देने के सिवा मुझे  कुछ आता नहीं !!!!!                        पुष्प प्रेम की सौगात प्रकृति का अनुपम उपहार                                          एक दिन मैंने पुष्प से पुछा                                       आकाश की छत मिटटी की गोद ,                                    क्या कारण है जो काटोंकेबीच भी,                                    बगीचो की शोभा बढ़ाते हो ,                               दुनिया को रंग-बिरंगा खूब सूरत बनाते हो           ...

तिजोरियां

तिजोरियां तो हैं ! सही बात है  सब कहते हैं कई युगों से यह तिजोरियां बंद पङी हैं  खुली नहीं हैं  तिजोरियां हैं तो कुछ ना कुछ कीमती भी जरुर होगा  जानना तो हर कोई चाहता होगा  तिजोरियों में क्या छिपा होगा तो फिर ढूढिये कूंजी मानचित्र की जो बता सके सही दिशा । कहां जा रहे हो सच्ची खुशी की तलाश में  एक राज की बात बताऊं ! बाहर मत जाओ ,बाहर जाओगे तो भटक जाओगे     क्योंकि ? कीमती मूल्यवान वस्तुऐं अक्सर  तिजोरियों में छिपाकर रखी जाती हैं । भीतर की यात्रा पर निकल जाओ  अमूल्य रत्नों की भरमार मिलेगी । कई रहस्यमय शक्तियों से पहचान होगी  चमत्कारों की खान मिलेगी । तिजोरियों की रहस्यमयी दिशाऐं  भीतर गहरी गुफाऐं अद्भुत अदृश्य अकथनीय,  अवर्णनीय तिजोरियां । अंतहीन यात्रा रास्ता सही पकड़ लिया तो  निकल जाओगे मंजिल की ओर  एक से एक अजूबों से मुलाकात होगी। कई असीम शक्तियों से साक्षात्कार होगा  कई विचित्र परिस्थितयां समक्ष आयेंगी  घबराना मत विचलित मत होना 

परम्परा

स्वागत की परम्परा तो हम इस.कदर निभाते हैं  की गुलाब ना भी मिले अगर राहों में बिछाने के लिए   हम अपनी पलकों के कमल बिछाते हैं। आवभगत में तो.हम आसमान से तारे भी तोङ.लाते हैं  आज कोई हमारा मेहमान है, तो कल हम भी किसी के मेहमान हो सकते हैं  स्वागत की चाह हर कोई रखता है  फिर  हम जो चाहते हैं वो हम देना भी सीखें  मन में जज्बा लिये कुछ कर दिखाने का  बस कुछ ना कुछ करते रहे,करते रहे और आगे निकल गये  करते रहे ,पर यूं ही नहीं कुछ भी करते रहे  माना की राहें अंजानी थीं  मन की ना मेहमान थीं  फिर भी अतिथि सम्मान में  स्वागत की परम्परा निभाते रहे  खुशीयां देकर खुशियों से दामन भरते रहे   बेमतलब में नहीं यूं ही सफर करते रहे  सफर में तजुर्बों से झोली भरते रहे  नजर लक्ष्य पर थी,मन में उम्मीद थी  मंजिलों की राहों से अंजान थे  पर दिल में ठसक थी ,उम्मीद की किरण की चमक थी  कहते हैं ना जहां चाह वहां राह  बस राहों में चाहों का रंग भरते रहे  जीवन में खुशियों के रंग भरने थे  एक उम्मीद एक किर...

जश्न की तैयारी

जश्न की करनी है तैयारी  एकत्रित करनी है आवयशक वस्तुतऐं सारी  जश्न मना सफर कर  अंजान हैं राहें, लौटना होगा मगर  यह भी तय है  पगडंडियों की ना परवाह कर   रास्तों की उबड़-खबङ  पैरों में पत्थरों की रगङ  गम ना कर ज़ख्म यह भर जायेगें  हार -जीत की ना तू परवाह ना कर  चल निकल चल चलाचल  ऊंच-नीच की पहाङियां  समीप गहरी खाईयां  रास्ते कट जायेगें  नामुमकिन तो कुछ भी नहीं  तू खुद शहनशाह  तू स्वयं ही अपना बादशाह   सवालों को तू हल कर   बुद्धि,विवेक की कूंजियां  भीतर तेरे पूजियां  रास्तों की ना तू फिक्र कर  ऊंचें पहाड़ हो या गहरी खाईयां  काम तेरा है मंजिल तक पहुँचना  श्रेणी की  ना कर लालसा  कर्म की रख प्रधानता  जश्न मना कर ना देर कर  प्रश्नों के तू हल निकाल  जीवन बनेगा तेरा खुशहाल।  

परवरिश बाल मन की

       प्रस्तावना  आगे बढना प्रकृति का नियम है। प्रकृति एवं मनुष्य अपनी -अपनी नियति के अनुसार बढ़ते रहते है,उनका एक जीवन चक्र है जो निर्धारित समय के अनुसार चलता रहता है । *यहां हमारा विषय है *परवरिश बाल मन की*  हल्के में मत लिजिए इस परवरिश को ,बहुत ही जिम्मेदारी का काम है यह परवरिश* प्रकृति के संरक्षण के लिए परमात्मा ने स्वयं व्यवस्था की है ,मौसमों के रुप में ,वायु सूर्य मिट्टी खाद ,जल प्रकृति का पोषण करते हैं ।   आज का मंहगाई का जमाना , परिवार का खर्चा चलाना , बिजली ,पानी दुनियां भर की आधुनिक सुविधाओं की आवयशकता ,बच्चों की शिक्षा के नये-नये कार्यक्रम उसके खर्चे ,कई परिवारों में आवयशकता हो जाती है ,पति -पत्नी दोनों का घर से बाहर निकल कर काम करना ।  क्यों ना हो , सबको समानता का अधिकार जो है ।अगर सामने वाले में काबिलियत है ,तो काम करने में कोई बुराई  नहीं ।                   (  1)  सरीन परिवार शहर का एक सम्पूर्ण सम्पन्न परिवार धन -दौलत एश ओ आराम घर के सदस्यों के मुंह से एक भी मांग निकल...

मेरे अपने

जिससे मैं अक्सर बातें करती हूं  वो मेरे सामने नहीं होकर भी  मेरे पास होता है, लोग कहते हैं  यह तेरे मन का धोखा है  मैने उसे अपनी मन की आंखों से देखा है  वो मुझे मुस्कराने की वजह देता है  मेरे दुख-सुख में मुझे बिन कहे सम्भाल लेता है   कैसे ना कहूं वो मेरा अपना है । मुझे हर परिस्थित में वो सम्भालने के गुण सिखा देता है । वो.धरती पर नहीं आसमान की ऊंचाइयों में रहता है  मेरी सोच आसमान से ऊपर उड़ने लगी है मैं रहती धरती पर हूं  बातें आसमान की करती हूं  चलती धरा पर हूं  और नजरें ऊपर आसमान की  ओर रहती हैं । ऊपर की ओर इसलिए नहीं की स्वयं को बडा  समझती हूं ढूंढती हैं मेरी नजरें उसको आकाश की ऊंचाईयों में  क्योंकि वो मेरा परमात्मा सर्वोत्तम रहता है सर्वोच्च  ऊचांइयों में ।